पहले अशरे में रहमत की दुआ मांग रहे रोजेदार
झांसी। इबादत की खुशबू लिए रमजान उल मुबारक का मुकद्दस महीना चल रहा है। सभी मस्जिदें इबादत की खुशबुओं से महक रही हैं। सुबह शाम मस्जिदों में नमाजियों की भीड़ नजर आ रही है। सबसे ज्यादा भीड़ रात को होने वाली विशेष नमाज- ए - तराबीह में नजर आती है। रमजान को तीन अशरों (दस-दस के तीन हिस्सों) अशरों में बांटा गया है। पहला अशरा रहमत का है। दूसरा हिस्सा बरकत और तीसरा दोजख की आग से निजात का है। पहले अशरे के छह रोजे पूरे हो चुके हैं। अब चार रोजे बचे हैं। इसलिए रोजेदार इफ्तार के वक्त अल्लाह से रहमत के लिए दुआ मांग रहे हैं। अल्लाह की रहमत ही है कि तेज धूप से कुछ राहत मिली है।
रमजान में रोजा अहम इबादत है। रमजान अल्लाह तआला का महीना है। अल्लाह कहता है कि रोजेदार को उसके रोजे का बदला हम स्वयं देंगें। इसे कुरान का महीना भी कहा जाता है। रमजान में पांचों वक्त की नमाज के अलावा इशा की नमाज के बाद रात्रि में बीस रकात तरावीह में कुरान का पूरे माह सुनना जरूरी है। तरावीह के लिए हाफिज मौखिक रूप से कुरान नमाज के दौरान पढ़ाते हैं और बाकी नमाजी उसे सुनते हैं।
तरावीह के दौर तीन, सात, पंद्रह, इक्कीस, पच्चीस, सत्ताईस और उन्तीस दिन के होते हैं। एक रात में पूरा कुरान पढ़ने और सुनने को शबीना कहते हैं, जो कम ही स्थानों पर कराया जाता है। रमजान में कुरान की तिलावत भी अहम इबादत है। वहीं रोजा इफ्तार करवाने में भी बड़ा सवाब है। लोग इफ्तार पार्टियां भी आयोजित करते हैं। रमजान में दिखावे को अल्लाह पंसद नहीं करता।
पवित्र माह रमजानुल मुबारक में रोजे के बाद दूसरा अहम स्थान नमाज - ए - तरावीह का है। तरावीह की नमाज की बड़ी फजीलत है। बेशुमार रिवायतों में रोजे और तरावीह का जिक्र एक साथ किया गया है, जिससे पवित्र माह रमजानुल मुबारक में रोजा रखने के साथ - साथ तरावीह पढ़ने की खास महत्ता का पता चलता है। जामा मस्जिद के पेश इमाम मोहम्मद हाशिम ने बताया कि हज़रत अब्दुल रहमान बिन औफ रजि. की रिवायत है कि सरकारे दो आलम मोहम्मद सल्ल. ने इरशाद फरमाया रमजान का महीना ऐसा महीना है, जिसमें अल्लाह ने तुम पर इसके रोजे फर्ज किए हैं और मैंने तुम्हारे लिए इस माह में कयाम (इबादत के लिए खड़ा होना) मसनून करार दिया है, इसलिए जो शख्स ईमान की हालत में इस महीने के रोजे रखेगा और उसमें कयाम करेगा तो वह गुनाहों से इस तरह पाक और साफ हो जाएगा जैसे उसकी मां ने उसे आज ही जन्म दिया हो।
पवित्र माह रमजानुल मुबारक के पूरे महीने में बीस रकात तरावीह मर्द व औरत दोनों के लिए सुन्नते मुअक्कदा है। बिना किसी वजह के तरावीह छोड़ने वाला या बीस रकअत से कम रकात पढ़ने वाला गुनहगार होगा। तरावीह जमात के साथ पढ़ना मसनून है तथा महिलाओं को अपने घरों में ही तरावीह की नमाज अदा करनी चाहिए। हाफिज मोहम्मद राशिद, बरेली
रोजा सिर्फ भूखे प्यासे रहने का नाम नहीं
रमजान का महीना बेहद पाक और रहमतों वाला होता है। रमजान में एक नेकी का सवाब सत्तर गुना बढ़ा दिया जाता है। नफिल इबादत का सवाब फर्ज के बराबर मिलता है। रमजान में शयातीनों को अल्लाह कैद कर देता है ताकि लोग आसानी के साथ रोजा रख सकें, तरावीह अदा कर सकें और कुरान पाक की तिलावत कर सकें।
रमजान का महीना 29 या 30 दिन का होता है। जो चांद दिखने के साथ शुरू होता है, अगला चांद दिखने के बाद दूसरे दिन ईद मनाई जाती है। बताते हैं रात के आखिरी पहर सुबह सादिक से पहले सेहरई (हल्का खाना खाना) करके रोजे की नीयत करके रोजा रखा जाता है। रोजा सिर्फ भूखे प्यासे रहने का नाम नहीं है। रोजा आंख, हाथ, पैर, दिल, मुंह सभी का होता है, ताकि रोजा रखने वाला इंसान हमेशा बुराई से तौबा करता रहे। रोजा सूरज निकलने से लेकर सूरज डूबने तक का होता है। इस दौरान वह कुछ खा पी नहीं सकता। रोजे की शुरुआत में फजर की नमाज होती है। रोजा खोलने के वक्त मगरिब की नमाज होती है।