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न ज्यादा लागत और न ही रखरखाव की चिंता

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न ज्यादा लागत और न ही रखरखाव की चिंता
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झांसी। मेंथा की खेती में न ज्यादा लागत लगती है और न ही उसका रखरखाव किया जाता है। जड़ों की रोपाई करने के बाद फसल तैयार होने लगती है। इसे न अन्ना जानवर खाते हैं और न ही प्राकृतिक आपदा का भय है। परंपरागत खेती गेहूं, मक्का, सरसों, अरहर, मूंग की फसल के दौरान अगर बेमौसम बारिश होती है तो किसानों को भारी नुकसान होता है, लेकिन इस फसल को बेमौसम बारिश फायदा ही पहुंचाती है।
मेंथा की फसल में आम फसलों की अपेक्षा तीन गुना पानी लगता है। गेहूुं की फसल में लगभग चार बार पानी देना पड़ता है, लेकिन मेंथा की फसल तैयार होने तक बारह बार तक पानी देना पड़ता है। हर पंद्रह से बीस दिन में फसल को पानी की आवश्यकता होती है। यह फसल काली मिट्टी में उगती है।
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फसल तैयार होने के बाद इसका बाजार भी आसपास है। बुंदेलखंड क्षेत्र का पिपरमेंट तेल का सबसे बड़ा मार्केट कोंच में है। इसके अलावा जालौन, गुरसराय (झांसी), महोबा, छतरपुर, मल्हारा में भी इसे बेचा जा सकता है।

ऐसे करें रोपाई
एक एक ड़ में बुवाई के लिए ढाई से तीन क्विंटल जड़ों को आठ से 10 सेमी के टुकड़ों में काटकर उसे खेत में फैला दिया जाता है। इसके बाद ट्रैक्टर कल्टीबेटर से खेत को सपाट कर पानी लगा दिया जाता है। पंद्रह दिन में फसल उग आती है। इसके बाद डीएपी का छिड़काव किया जाता है।
प्रजातियां
एम. एस. ए.-1(देशी), कोसा (जापानी पोदीना), हिमालय गोमती (एम. एच. ए.-9), एम. एच. वाई.-77
कीमत
वर्तमान में पिपरमेंट के तेल की कीमत 1600 से 1700 रुपये किलो है।

मेंथा की खेती में एक एकड़ में औसतन 70 से 80 हजार लीटर पानी की आवश्यकता होती है। 15 से 20 दिन में नियमित रूप से इसकी सिंचाई करते रहना चाहिए।


दो साल से इसकी खेती कर रहे हैं। मेंथा नकदी फसल है इसको बेचने से पैसा तुरंत मिल जाता है, जबकि अन्य फसलों का मंडियाें से पैसा 15 से 20 दिन में मिलता है। - धर्मेश पटेल

2017 से इसकी खेती आरंभ की थी। गेहूं, चना, मटर, सरसों की खेती पर प्राक ृतिक आपदाओं व बेमौसम बरसात का खतरा ज्यादा रहता है, इसकी अपेक्षा मेंथा की खेती सुरक्षित है। - बृजेंद्र सिंह

बुंदेलखंड में अन्ना पशुओं की प्रमुख समस्या है। अन्ना पशु गेहूं, चना, मटर की फसल चट कर जाते हैं, जबकि मेंथा में विशेष प्रकार का केमिकल होने के कारण पशु इसे नहीं खाते हैं। - बालमुकुंद
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फोटो-
परंपरागत खेती से हम एक एकड़ में महज 20 से 25 हजार रुपये ही एक सीजन में बचा पाते थे, पिपरमेंट से एक लाख तक की बचत हो जाती है। - हरप्रसाद पटेल
ऐसे निकलता है तेल
इसके प्लांट में तीन टंकी होती हैं। एक में मेंथा की कटी फसल भरकर नीचे से आग जला देते हैं। फसल से तेल व भाप से बना पानी दूसरी टंकी में पहुंचता है। इसके बाद तीसरी टंकी में जाकर पानी व तेल अलग-अलग हो जाता है। झांसी के अलावा जालौन व अन्य जनपदों में किसानों ने खेत पर यह प्लांट लगा रखे हैं।
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