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ईद की नमाज से पहले अदा करे फितरा

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ईद की नमाज से पहले अदा करें फितरा
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झांसी। मुकद्दस रमजान में रोजेदार रोजे रखकर अल्लाह की इबादत करते हैं। ईद से पहले फितरा अदा करना जरूरी है। इसीलिए इसे ईदुल फितर भी कहते हैं। फितरे की रकम से गरीबों की मदद हो जाती है। ईद से पहले फितरे की रकम देने से गरीब भी किसी चीज से महरूम नहीं रहते हैं। फितरा ही रोजों में होने वाली कमी को भी दूर करता है।
इबादतों का महीना रमजान रुखसत होने को है। यह महीना इबादतों का है। इस महीने की शुरुआत होते ही अल्लाह शैतान को कैद कर देते हैं। इसी महीने में जहन्नुम के दरवाजों को बंद कर दिया जाता है। रमजान के महीने को रहमत और बरकतों का महीना कहा जाता है। इस महीने में सवाब का दर्जा सत्तर गुना अधिक होता है। इस पर लोग अधिक से अधिक इबादत करना पसंद करते हैं। इस दौरान रोजेदार रोजा रखकर, नमाज पढ़कर, हदीस पढ़कर, कुरान पढ़कर अल्लाह की इबादत करते हैं।
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ईद की नमाज से पहले हर किसी को फितरा अदा करना होता है। फितरे में अनाज व रुपयों में से कोई एक अदा करना होता है। हर साल राशन के हिसाब से फितरा अदा किया जाता है। इस बार फितरे की रकम पैंतीस रुपये तय की र्गई है। फितरा का मकसद रोजे की हालत में होने वाले गुनाहों से खुद को पाक करना है। अगर कोई बच्चा ईद के दिन भी नमाज से पहले पैदा होता है, तो उसके मॉ-बाप को फितरे की रकम को अदा करना होगा। सदका-ए-फितरा लेने के वो लोग हकदार है जो जकात के हकदार हैं। यह गरीबों, मिस्कीनों के लिए ईद के दिन की मदद है जिससे की गरीब भी ईद का त्योहार को मना सकें।
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मुफ्ती साबिर कासमी ने बताया कि ईद के दिन अल्लाह मेजबान होते हैं और तमाम बंदे अल्लाह के मेहमान होते हैं। फितरे के जरिये हर बंदे की मेहमानी को अंजाम तक पहुंचाया जाता है। फितरा के माध्यम से ईद के दिन गरीब भी अमीर की तरह से ईद मनाता है।
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