यूं ही नहीं रखे गए दरवाजों के नाम
झांसी। नगर को घेरते हुए बनाए गए लगभग 20 फीट ऊंचे और छह से 12 फीट तक चौड़े इस परकोटे में शहर में प्रवेश करने के लिए 10 द्वारों का निर्माण भी कराया गया। वैसे तो इन दरवाजों के नाम लिंक मार्ग के नाम से ही रखे गए। लेकिन, खंडेराव गेट व सैंयर गेट का नाम रखने की वजह दूसरी थी। खंडेराव गेट का नाम रानी लक्ष्मीबाई पार्क के पास स्थित एक मंदिर के नाम से रखा गया, जबकि सैंयर पहाड़ी के नाम से सैंयर गेट को पहचान दी गई। इसके साथ ही दतिया गेट, उनाव गेट, ओरछा गेट, बड़ागांव गेट, लक्ष्मीगेट, सागर गेट, भांडेरी गेट, झरना गेट बनवाए गए। इन दरवा़जों को स्थापित करने के दो कारण थे। दुश्मनों से सुरक्षा करने के लिए दरवाजे पर सिपाही तैनात किए जाते थे। रात में इन्हें बंद कर दिया जाता था, जिससे कोई बाहरी आसानी से नगर में प्रवेश न कर पाए।
जबकि, दूसरी वजह राजस्व वसूली थी। नगर से होकर गु़जरने वाले लोगों से दरवाजे पर कर भी वसूला जाता था। अब भी अधिकांश गेटों के पास पुलिस चौकियाँ विद्यमान हैं। इन गेटों का निर्माण इस तरह मोड़ देकर किया गया था, ताकि तेज गति से कोई प्रवेश न कर पाए और बाहर से आने वाले व्यक्ति को गेट पर बैठे सिपाही नजर न आएं। गेटों का निर्माण चूने के मसाले द्वारा लखौरी ईट तथा ग्रेनाइट पत्थर से किया गया। अनेक द्वार दो मंजिला हैं, जिनके ऊपर पहुंचने के लिए सीढ़ियों का निर्माण भी किया गया है। द्वारों के प्रवेश पद्म पंखुड़ियों की आकृति के मेहराबदार हैं। ओरछा गेट के प्रवेश द्वार में कालांतर में कुछ निर्माण कर इसे दंतुलिका प्रकार के मेहराब से सजाया गया है। सभी द्वारों पर लकड़ी के दरवाजे लगाए गए थे। अगर, वर्तमान स्थिति पर नजर डालें तो अधिकांश गेट जर्जर हालत में पहुंच चुके हैं। खंडेराव गेट का तो सिर्फ नाम ही शेष रह गया है। गेट कहां और कब गायब हुआ, किसी को नहीं पता। चांद गेट, उन्नाव गेट, बड़ागांव गेट, लक्ष्मी गेट तथा सैंयर गेट के दरवा़जे शेष बचे हैं। लेकिन, यह भी खस्ताहालत में हैं। सैंयर गेट का एक दरवाजा पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुका है, तो बड़ागांव गेट का अब दाहिना दरवाजा ही शेष रह गया है।