झांसी। पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ने वाली आनुवांशिक बीमारी हीमोफीलिया विषम परिस्थितियों में जानलेवा साबित हो सकती है। इस बीमारी के लक्षण पता चलते ही तुरंत डॉक्टर से मिलें। झांसी मेडिकल कॉलेज में हीमोफीलिया के लिए जरूरी इलाज निशुल्क उपलब्ध है। बुंदेलखंड में 114 लोग इस बीमारी से ग्रस्त हैं।
महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज के डॉ. ओमशंकर चौरसिया और डॉ. नूतन अग्रवाल ने बताया कि मेडिकल कॉलेज में सोसाइटी के तहत हीमोफीलिया क्लीनिक चलाई जा रही है। इससे हीमोफीलिया से ग्रस्त मरीज को निशुल्क इलाज दिया जा रहा है। बुंदेलखंड में हीमोफीलिया के फिलहाल 114 मरीज हैं, इनका इलाज मेडिकल कॉलेज में किया जा रहा है। इस बीमारी से ग्रस्त कोई भी मरीज मेडिकल कॉलेज की ओपीडी में इलाज के लिए आ सकता है।
डॉक्टर बताते हैं कि हीमोफीलिया आनुवांशिक बीमारी है। माताएं इस रोग की वाहक होती हैं। इससे यह पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ती है। इस बीमारी में किसी तरह की चोट लगने पर शरीर के बाहर बहता हुआ खून जमता नहीं है। खून को रोकने के लिए इंजेक्शन के माध्यम से क्लॉटिंग फैक्टर-8 और फैक्टर-9 दिया जाता। यह इंजेक्शन खून को बहने से रोकता है।
पुरुषों में अधिक बीमारी होती है। गंभीर स्थिति में मरीज की मौत भी हो सकती है। इसमें रक्त में विशेष प्रोटीन की कमी होती है। इसे क्लॉटिंग फैक्टर कहा जाता है। यह रक्त को जमा कर उसका बहना रोकता है। उधर, पहले बीमारी से ग्रस्त लोगों को इलाज के लिए दिल्ली, मुंबई या कानपुर जाना पड़ता था। इसमें काफी पैसा खर्च होता था और इलाज में भी कई बार देरी हो जाती थी।
हीमोफीलिया का मरीज सामान्य जीवन जी सके, इसके लिए समय पर जांच और पर्याप्त इलाज बहुत जरूरी है। अब सोसाइटी के तहत सभी को मेडिकल कॉलेज में निशुल्क इलाज मिल रहा है। इस बीमारी में सावधानी बेहद जरूरी है।
-प्रोफेसर डॉ. नूतन अग्रवाल, अध्यक्ष- मेडिकल कॉलेज मेडिसिन विभाग
114 मरीज हीमोफीलिया से ग्रसित हैं। इनमें आठ मरीज फैक्टर-9 हीमोफीलिया के हैं। इनमें ज्यादातर बच्चे और युवा हैं। इनका इलाज विभाग में चल रहा है। ये मरीज झांसी के अलावा ललितपुर, शिवपुरी, ग्वालियर, महोबा, जालौन और बबीना आदि शहरों के हैं।
-डॉ. ओमशंकर चौरसिया, बाल रोग विभागाध्यक्ष एवं हीमोफीलिया विभाग इंचार्ज
केस-1
झांसी के 24 साल के युवा बताते हैं कि पिछले छह-सात साल से उनका इलाज मेडिकल कॉलेज में चल रहा है। उन्हें फै क्टर-8 के इंजेक्शन दिए जाते हैं। बचपन से ही कठिनाई होती है। दिक्कत ज्यादा बढ़ जाने पर खूब चढ़ाने की नौबत भी आ जाती है। यह बीमारी उनके मामा और भाई को भी है।
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केस-2
ललितपुर निवासी 5 वर्ष का बच्चा भी इस बीमारी की चपेट में हैं। इनके दादा बताते हैं कि पिछले वर्ष पेट में अंदरुनी चोट लगने से ट्यूमर हो गया था। जिसको सर्जरी के लिए जरिए निकाला गया था। उसे चोट लगने से बचाना पड़ता है। बच्चा खेलने भी जाता है, तो उसका ध्यान रखते हैं।
हीमोफीलिया के लक्षण
-चिड़चिड़ापन, उल्टी, दस्त, ऐंठन और चक्कर आना।
-सांस लेने में समस्या, खून या काले रंग की उल्टी होना।
-शरीर पर लाल, नीले, काले गांठदार चकत्ते पड़ना
-सूजन, दर्द या स्किन का गर्म महसूस होना।
-मांसपेशियों में दर्द व दिक्कत महसूस होना।
सावधानी है जरूरी
-एनासिन या एस्परीन सॉल्ट वाली दवाएं न लें।
-प्राथमिक इलाज के तौर पर चोट लगे हिस्से पर बर्फ की सिंकाई करें।
-चोट को क्रे प बैंडेज से बांधकर ऊंचा रखें, ताकि खून थम सके।