जिला कारागार परिसर में स्थित कर्मचारियों के जर्जर आवास।
जिला कारागार के 146 साल पुराने जेल बैरकों में बंदी रात गुजार रहे हैं। जेल की दीवारें इस कदर जर्जर हो गई हैं कि कभी भी दरक सकती हैं। बंदियों की जो बैरकें हैं उनकी छत बारिश में टपक रही है। बंदी रक्षकों के आवास भी जर्जर हो गए हैं। जिसकी वजह से बंदी व बंदी रक्षक बारिश में सो नहीं पाते हैं।
35 एकड़ में जिला कारागार परिसर स्थापित किया गया है। इस परिसर में 15 एकड़ में जेल परिसर है। बाकी में बंदी रक्षकों के आवास, अधीक्षक आवास, खाली जमीनें हैं। जेल में वैसे तो महिला बैरक लेकर कुल 10 बैरकें हैं।
इसमें आधे से अधिक बैरक टीनशेड के हैं। इनकी दीवारों का प्लास्टर हल्की बारिश में ही गिरने लगता है। वैसे जेल प्रशासन ने प्लास्टिक जरूर डाला है लेकिन बारिश में इसका कोई खास असर नहीं है। छत वाली बैरकें में सीलन व बूंदाबादी होती रहती है।
जेल अधिकारियों की शिकायत पर जेल मुख्यालय से तकनीकी अधिकारी आकर जेल की स्थिति देख चुके हैं। जेल हाते की दीवारों में दरार पड़ गई हैं। बैरकें जर्जर हो गई हैं। बंदी रक्षकों के आवास में घासें उग आई हैं। चारो तरफ जंगल जैसी स्थिति होने की वजह से जानवरों का डेरा हो गया है।