टीडी कालेज के बलरामपुर हाल में बृहस्पतिवार को आयोजित कवि सम्मेलन में कवियों ने शब्द रचनाओं से दुर्व्यवस्था पर प्रहार किया। कविता, गीत, छंद, मुक्तक आदि प्रस्तुतियों पर पूरा हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजता रहा। कार्यक्रम की शुरुआत कवियित्री रचना तिवारी ने सरस्वती वंदना से की।
नए वर्ष के पहले दिन साहित्यिक, सामाजिक संस्था कोशिश की ओर से आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलन और मुशायरा में डा. कमलेश राय ने गीत प्रस्तुत किया-तुलसी चौरा पे दियना के बार चले ली, ऊ त मानत मनौती हजार चलै ली...सुनाकर मंत्रमुग्ध कर दिया।
बिहार के सीवान से आए सुभाष यादव ने अपनी रचना-बांसुरी दर्द के गीत गाती रही, चांदनी रातभर मुस्कुराती रही...सुनाकर खूब वाहवाही लूटी। जमुना प्रसाद उपाध्याय ने सुनाया-जलती हुई पगडंडी पर चलने का हुनर देख, हम धूप की जद में हैं, निकलने का हुनर देख...। अहमद निसार के शेर कल बहुत रोए थे हम जिसको बयां करते हुए...को खूब सराहना मिली।
रचना तिवारी की कविता चांदनी मुंह छुपाती रही रातभर सुनकर श्रोताओं ने शृंगार रस में गोते लगाए। नोयडा से आए कवि बाबा कानपुरी ने प्रतीकों के माध्यम से लोगों को गुदगुदाया। झगड़ू भैया ने भोजपुरी में सुनाया- डर लागेला झगड़ू भइया गोजी लेके धोवै लगिहैं, चूनी-भूसा डालि के झट से सूई भोंकि के दूहै लगिहैं...। प्रो. अनूप वशिष्ठ का शेर कुछ सकुचाना, कुछ शरमान अच्छा लगता है...सुनाया।
अध्यक्षता कर रहे बुद्धिसेन शर्मा ने पढ़ा-वहीं हीरा निकलता है, वहीं कोयला निकलता है, तो क्या आपस में दोनों का कोई रिश्ता निकलता है...। इस पर हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। इसके अलावा गिरीश, अशोक मिश्र, प्रखर जी, जनार्दन अस्थाना, असीम मछलीशहरी, अकिल, पीसी विश्वकर्मा, ओपी खरे आदि ने भी अपनी रचनाएं सुनाईं। इससे पूर्व टीडी कालेज के प्रबंधक अशोक कुमार सिंह ने कार्यक्रम का शुभारंभ किया।
इस मौके पर डा. यूपी सिंह, नपा अध्यक्ष दिनेश टंडन, डा. लालजी त्रिपाठी, डा. लाल साहब, डा. एके सिंह, डा. समर बहादुर सिंह आदि रहे। संचालन अनूप वशिष्ठ, धन्यवाद ज्ञापन प्रो. आरएन सिंह ने किया।