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फैक्ट्री के साथ अरमानों पर भी लगा ताला, छिन गया निवाला

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25- मुंगराबादशाहपुर में सवारी का इंतजार करते प्रवासी श्रमिक व उनके बच्चे। - फोटो : JAUNPUR
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मुंगराबादशाहपुर। परदेश से लौट रहे प्रवासियों के दर्द की इंतहा नहीं है। रोजगार ठप होने के बाद परदेश में कोई ठौर न मिलने के बाद उनके पास घर वापसी के सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। घर आ रहे मजदूर अपनी बेबसी की पीड़ा बताते हुए व्यथित हो जा रहे हैं।
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नौपेड़वा विनोद गुजरात के सूरत में एक कपड़ा फैक्ट्री में काम करते थे। परिवार के कई अन्य सदस्य भी यहां सेवा दे रहे थे। इससे अच्छी खासी तनख्वाह बनती थी, जिससे कुनबे का भरण पोषण व अन्य जरुरतें आसानी से पूरी हो रही थीं। उन्होंने बताया कि लॉक डाउन का चक्र चला तो फैक्ट्री का बंद होने लगी। फैक्ट्री मालिक ने उसे चलाने की पूरी कोशिश, लेकिन नाकामयाबी हाथ लगी। थक हारकर उसने काम करने वाले 73 मजदूरों से हाथ जोड़ लिया। दो जून की रोटी भी मयस्सर नहीं हो पा रही थी। काफी विनती के बाद फैक्ट्री मालिक ने रास्ते का खर्च दिया और बोला आने वाले परिस्थितियां तय करेगी कि दोबारा फैक्ट्री में काम मिलेगा या नहीं। विनोद अपने परिवार गोलू, आनंद, खुशी, राजेश, सुरेश, रमेश, रंजीत, रंजीता, सुमन, निर्मला के साथ गुजरात से पैदल ही निकल पड़ा। लंबा सफर तय करने के बाद ट्रकों का सहारा मिला, जो पूरे परिवार को प्रयागराज तक लेकर आई। विनोद ने बताया कि कभी भूखे पेट सोना पड़ा तो प्यास की शिद्दत से नींद नहीं आई। छोटे बच्चे भूख और प्यास से एकटक निहारते रहे। प्रयागराज से एक टेंपो का सहारा मिला तो मुंगराबादशाहपुर तक पहुंचाया। थका हारा परिवार पेड़ के छांव के नीचे बैठ गया। लोगों ने कुछ मदद की तो चेहरे पर ताजगी आई। फिर वह वाहन में सवार होकर घर की ओर इस उम्मीद से निकल दिए गांव के लोग बोलेंगे कि परदेशी कोरोना लेकर आ रहा, लेकिन मां बोलेगी कि मेरा बेटा आ रहा है।
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