जौनपुर। काम की तलाश में घर छोड़कर बड़े शहरों में धक्के खाने वाले, बेरोजगारी का रोना रोने वाले युवाओं के लिए जौनपुर के यादवेेंद्र दत्त मौर्य नजीर हैं। अपनी लगन और मेहनत के बल पर उन्होंने सफलता की बड़ी लकीर खींची है। घर बैठे ही वह 4-5 लाख रुपये सालाना कमा रहे हैं। इसके लिए मधुमक्खी पालन को जरिया बनाया है। महज पांच डिब्बे से उन्होंने इसकी शुरुआत की थी, जो आज 500 डिब्बे तक पहुंच गई है। कोरोना काल में शुरू सरकार की योजनाओं से जुड़कर अब वह खुद अपना प्रोडक्ट बनाकर मार्केट में उतारने जा रहे हैं।
बरसठी निवासी यादवेंद्र दत्त मौर्य स्नातक पास हैं। पढ़ाई के बाद उन्होंने गांव में ही पिता की इलेक्ट्रिक की दुकान संभालनी शुरू की, मगर गांव की इस दुकान से आमदनी नहीं थी। लिहाजा इसे बंद करना पड़ा। कई महीनों तक काम की तलाश में भटकने और आर्थिक संकट से जूझने के बाद उन्हें अखबार से मधुमक्खी पालन में रोजगार के बारे में जानकारी मिली। प्रयागराज से नि:शुल्क प्रशिक्षण लेने के बाद उन्होंने पांच डिब्बे से मधुमक्खी पालन की शुरुआत की। लेकिन पहले प्रयास में उन्हें सफलता नहीं मिली और चार डिब्बे की मधुमक्खियां मर गईं। उन्हें पड़ोसियों के ताने भी सुनने पड़े, मगर हिम्मत न हारते हुए उन्होंने प्रयास जारी रखा। उनका धैर्य और संघर्ष काम आया। कठिन मेहनत के बल पर उन्होंने मधुमक्खी पालन में अपना नाम कमाया है। आज वह पांच सौ डिब्बों में मधुमक्खी पालन कर रहे हैं। गांव के अलावा जिले के विभिन्न क्षेत्रों में भी बाग-बगीचों में डिब्बे लगाकर शहद निकाल रहे हैं। रोल मॉडल बनकर वह विभिन्न संगठनों के माध्यम से अन्य युवाओं को भी इसमें प्रशिक्षण देकर रोजगार से जोड़ रहे हैं। जौनपुर के अलावा अमेठी, रायबरेली, सुल्तानपुर और पश्चिम यूपी के कई जिलों, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ तक युवा उनसे संपर्क कर मधुमक्खी पालन के लिए प्रेरणा ले रहे हैं। यादवेंद्र दत्त का कहना है कि मधुमक्खी पालन ऐसा व्यवसाय है, जिसमें एक रुपये लागत से सौ रुपये तक कमाया जा सकता है।
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अब खुद का प्रॉडक्ट बाजार में उतारने की तैयारी
यादवेंद्र ने बताया कि मधुमक्खियों के एक डिब्बे में औसतन 25 किलोग्राम शहद सालभर में प्राप्त होता है। अब तक वह शहद को सीधे पश्चिम यूपी के बाजारों में बेचते थे। इसके लिए उन्हें अतिरिक्त खर्च भी करना होता था और ज्यादातर मुनाफा शहद को शीशी में भरकर बेचने वाले दुकानदार उठाते थे। अब यादवेंद्र ने खुद का प्रॉडक्ट बनाने की तैयारी कर ली है। कोरोना काल में प्रधानमंत्री स्वरोजगार योजना से जुड़कर उन्होंने पैकेजिंग की इकाई स्थापित कर ली है। अब अपने शहर को नया नाम देकर वह बाजार में उतारने जा रहे हैं। इससे मुनाफा भी बढ़ेगा और दूसरे युवकों को भी रोजगार मिलने की संभावना है।
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गर्मी से बचाने की चुनौती
यादवेंद्र दत्त का कहना है मधुमक्खी पालन की सबसे बड़ी चुनौती गर्मी की है। सरसों की फसल कटने के बाद तेज धूप में मधुमक्खियों को बचाना, भोजन उपलब्ध कराने में दिक्कत आती है। इस समस्या के समाधान के लिए बिहार के मुजफ्फरनगर, मध्य प्रदेश मुरैना, छत्तीसगढ़ के अलावा कन्नौज, रायबरेली, अमेठी सहित उन स्थानों पर उन्हें ले जाया जाता है, जहां सूरजमुखी की खेती होती है। इससे मधुमक्खियां भोजन भी ले लेती हैं और शहद का निर्माण भी जारी रहता है। कई बार पर्याप्त भोजन न मिलने पर जिंदा रखने के लिए कृत्रिम आहार भी देना मजबूरी है।