फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

सरेआम फांसी के बाद गोलियों से भून दिए गए थे 22 सपूत........

विज्ञापन
विज्ञापन
केराकत। जंगे आजादी का जब भी जिक्र होगा तो उसमें सेनापुर के वीर सपूतों का नाम जरूर शुमार होगा। आजादी के 22 दीवानों ने अपने लहू से इस गांव की मिट्टी को सींचा है। अंग्रेजी हुकूमत की खिलाफत करने के कारण उन्हें पहले फांसी पर लटकाया गया, फिर गोलियों से छलनी कर दिया गया, ताकि एक भी सांस बाकी न रहे। गांव के मध्य में खड़ा शहीद स्तंभ आज भी उन शहीदों की गौरवगाथा को बयां कर रहा है।
विज्ञापन

बात 1857 में छिड़े उस पहले आंदोलन की है, जिसने पूरे देश में पहली बार ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जनता को उद्वेलित कर दिया था। मई में फूटी बगावत की चिंगारी जून आते-आते आग का शोला बन चुकी थी। वाराणसी की सैनिक छावनी में निहत्थे सिख सैनिकों पर अंग्रेजी सैनिकों की ओर से अंधाधुंध गोलियां बरसाने की खबर जौनपुर पहुंची तो यहां मौजूद सिख सैनिकों ने भी बगावत कर दिया। कमांडिंग अफसर को गोली मारकर मौत की नींद सुला दी। ज्वाइंट मजिस्ट्रेट कुप्पे को विद्रोहियों ने मार गिराया। इस आंदोलन का केंद्र केराकत और चंदवक के मध्य का सेनापुर गांव ही था। इसी जानकारी जब हुकूमत को हुई तो उन्होंने क्रांतिकारियों को पकड़ने के लिए फौज भेजी। गांव के 22 लोग पकड़े गए। सरेआम पंचायत में उन्हें पहले फांसी पर लटकाया और जब इससे भी मन नहीं भरा तो क्रूरता की हद पार करते हुए सभी को गोलियों से भून दिया गया। गांव के वीर सपूतों की इस शहादत को याद कर लोग आज भी भावुक हो जाते हैं। ग्राम प्रधान रमेश कुमार बताते हैं कि इस गांव के सपूतों ने ही बिहार के जगदीशपुर निवासी बागी कुंवर सिंह के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना को चंदवक के आगे गोमती नदी के दक्षिण दिशा की ओर खदेड़ दिया था। अंग्रेजों को कुछ गद्दारों की सहायता न मिली तो सेनापुर का संघर्ष इतिहास में एक अलग अध्याय बनता। गांव के हरिश्चंद्र सिंह, विनोद राव, शिवनारायण बताते हैं कि लंबे समय तक यह गांव भारतीय सेनानियों की छावनी भी रही, इसकी कारण इसे सेनापुर का नाम मिला। इसके पहले गांव को माधोपुर के नाम से जाना जाता था।
पुरखों की शहादत पर फख्र, बेकद्री का अफसोस
स्वतंत्रता आंदोलन में शहादत देने वाले सेनापुर के सपूतों की वीरता पर हर किसी को फख्र है। गांव के शिवनारायण, धीरज सिंह कश्यप कहते हैं कि देश की आजादी में हमारे पुरखों ने जो योगदान दिया, उस पर हमें गर्व है। हालांकि उन्हें इस बात का मलाल भी है कि इतनी बड़ी कुर्बानी के बाद भी उनकी स्मृतियों को सहेजने का कोई बंदोबस्त नहीं किया गया है। गांव में एक शहीद स्तंभ बना है, जिस पर शहीदों के नाम और उनकी वीरता की दास्तां अंकित हैं। इस शहीद स्तंभ पर वर्षों से सौ फीट ऊंचा ध्वज फहराने और स्मारक बनवाने की मांग होती रही है, मगर जनप्रतिनिधियों की उदासीनता से सिरे नहीं चढ़ पाई है। हर साल राष्ट्रीय पर्वों पर विभिन्न कार्यक्रमों में जब जनप्रतिनिधि आते हैं तो कई घोषणाएं करते हैं, फिर भूल जाते हैं।
विज्ञापन

शहीद स्तंभ पर अंकित हैं 15 शहीदों के ही नाम
शहीद स्तंभ पर लगे शिलापट्ट पर यदुवीर सिंह, शिवब्रत सिंह, जय मंगल सिंह, देवकी सिंह, राम दुलार सिंह, अभिलाष सिंह, ठाकुर सिंह, शिवराम अहीर, किशुन अहीर, माधव सिंह, विशेष्वर सिंह, छांगुर सिंह, रामभरोस सिंह समेत 15 शहीदों के नाम अंकित हैं। अन्य सात वीरों का नाम किसी को पता नहीं। गांव के रामप्यारे सिंह और धर्मेंद्र कुमार गुप्ता बताते हैं कि आंदोलन में गांव के 22 लोग शहीद हुए थे, मगर शहीद स्तंभ पर सिर्फ 15 लोगों के ही नाम अंकित किए जा सके हैं। अन्य सात शहीदों की पहचान स्पष्ट न होने के कारण उन्हें बिसरा दिया गया। पीढ़ियां बीतने के बाद अब कोई नहीं जानता कि वह सात गुमनाम शहीद कौन हैं।
---
विश्व बैंक अध्यक्ष इस मिट्टी को कर चुके हैं नमन
विश्व बैंक के तत्कालीन अध्यक्ष राबर्ट मैकन मारा मार्च वर्ष 1981 में सेनापुर गांव आए थे। उन्होंने इस माटी को नमन किया था। इस गांव में जन्में डॉ. आरडी सिंह ने अमेरिका के ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में विश्व बैंक के अध्यक्ष राबर्ट मैकन मारा व डिप्टी चेयरमैन डॉ. डब्लूडी हापर को शिक्षा दिया था। दोनों ने यहां आकर अपने गुरु के धरती कर नमन करते हुए इस धरती को वेरी गुड कहा था। डॉ. हापर यहां कुछ वर्षों तक रहकर गांव की आर्थिक स्थिति, भेष भूषा, भाषा, संस्कृति, जीवन स्तर, संस्कार, शैली आदि पर अध्ययन भी कर चुके हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें