जौनपुर। एड्स के प्रति जागरुकता बढ़ी है लेकिन मरीजों की संख्या में कमी के बजाय लगातार इजाफा ही हो रहा है। एआरटी सेंटर के आंकड़े
कुछ ऐसी ही कहानी सुना रहे हैं। पिछले पांच साल के अंतराल में जिले में चार हजार से अधिक एड्स के मरीज बढ़ गए। जिला अस्पताल के एआरटी सेंटर में पंजीकृत व्यस्क मरीजों को तो समय से दवाएं मिल जाती हैं पर 15 वर्ष तक के मरीजों को दवाएं समय से नहीं मिल पाती। जिससे इस बीमारी से पीड़ित बच्चों की तकलीफ बढ़ जाती है और वे असमय काल के गाल में समा जाते हैं।
जिला अस्पताल में वर्ष 2011 में एआरटी सेंटर की स्थापनी की गई थी। शुरुआती दौर में तो यहां बीएचयू के एआरटी सेंटर से मरीजों का नाम पता दिया जाता था। बाद में मरीज यहां सीधे आकर पंजीकरण कराने लगे। वर्ष 2014 में 1220 मरीज पंजीकृत थे। जबकि मौजूदा समय में यह संख्या बढ़कर 5200 हो गई है। इनमें 250 मरीज ऐसे हैं जिनकी उम्र 15 वर्ष या इससे भी कम है। एचआईवी पाजिटिव के साथ जी रहे मरीजों के लिए मदद करने वाली संस्था जौनपुर नेटवर्क फार एचआईवी पाजिटिव पीपुल लिविंग विथ एड्स सोसायटी (जेएनपीप्लस) की माने तो एचआईवी पाजिटिव के साथ जी रहे लोगों को सरकार की ओर से अपेक्षित मदद नहीं मिल पा रही है। विश्व एड्स दिवस पर एचआईवी पाजिटिव के साथ जी रहे रोगी सरकार से मदद की आस लगाए हुए हैं। लोगों को यह आसरा है कि अपने देश की सरकार भी विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक के मुताबिक इस देश में भी एड्स रोगियों का इलाज शुरू करने के मानक में बदलाव करेगी। जौनपुर समेत देश के अन्य हिस्सों में भी एड्स रोगियों का इलाज तब शुरू किया जाता है जब जांच में उनका सीडी-4 (रोग प्रतिरोधक क्षमता) 500 या इससे नीचे होता है। संगठन के लोगों की माने तो एचआईवी पाजिटिव रोगियों के लिए जो दवा चलती है वह काफी महंगी है। अगर सरकार डब्ल्यूएचओ के मानक को मानती है तो देश भर में करीब 23 लाख रोगियों का इलाज करना होगा। जबकि सीडी-4 का मानक कम होने के कारण आठ से 10 लाख रोगियों का ही इलाज करना होगा। बाकी के रोगियों को यह कहकर दिलासा दे दिया जाता है कि अभी उन्हें दवा की जरूरत नहीं है।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डा. रामजी पांडेय का कहना है कि एआरटी सेंटर में 5200 रोगी पंजीकृत हैं। उनकी समय से जांच और मुफ्त में दवा देने की व्यवस्था है। मगर हकीकत कुछ और ही है। मरीजों का कहना है कि जिला अस्पताल में स्थापित एआरटी सेंटर पर स्थायी रूप से डाक्टर की तैनाती नहीं है। यहां तैनात चिकित्सक डा. यूसूफ खान को एआरटी के साथ साथ त्वचा रोग विभाग की भी जिम्मेदारी दी गई है, जिससे एआरटी सेंटर पर आने वाले मरीजों को हमेशा डाक्टर नहीं मिल पाते।
कोट:
एचआईवी की जांच में रोग का पता चलते ही अगर समय से इलाज शुरू हो जाए तो एड्स रोगी भी लंबा जीवन जी सकते हैं। लेकिन विडंबना यह कि जांच में रोग का पता चलने के बाद भी इलाज शुरू होने के लिए रोगी का शरीर कमजोर होने का इंतजार किया जाता है।-दिनेश यादव संयुक्त सचिव, जेएनपी प्लस
कोट:
एआरटी सेंटर पर एड्स रोगियों के लिए दवा की उपलब्धता है लेकिन बच्चों के लिए दवा आपूर्ति समय पर नहीं पो पाती जिससे 15 वर्ष तक के मरीजों को दिक्कत होती है। दवा की उपलब्धता की साप्ताहिक रिपोर्ट राज्य मुख्यालय को भेज दी जाती है।
सुनील कुमार सिंह, परामर्शदाता, एआरटी सेंटर जौनपुर
इनसेट
कैंडिल मार्च निकाल कर किया जागरूक
जौनपुर। विश्व एड्स दिवस की पूर्व संध्या पर शुक्रवार की शाम को विभिन्न सामाजिक संगठनों की ओर से जेसीज चौराहे से कैंडिल मार्च निकाला गया। ओलंदगंज होते हुए कैंडिल मार्च सद्भावना पुल पर समाप्त हुआ। कैंडिल मार्च में टीबी अस्पताल, एआरटी सेंटर, आईसीटीसी और कई गैर सरकारी संगठन भी शामिल रहे। इस मौके पर मंजरी राय ने कहा कि इस रोग की समुचित दवा की खोज अभी तक नहीं हो सकी है। इसलिए लोगों को जागरुक करने की जरूरत है। बचाव ही इससे बचने का एक मात्र उपाय है। कैंडिल मार्च में भारतीय जन सेवा आश्रम, प्रोग्रेसिव एजेंसी टू ह्यूमिनिटी, डिस्ट्रिक लेबल नेटवर्क समेत अन्य संगठनों से जुड़े लोग शामिल थे। इस मौके पर सामाजिक कार्यकर्ता दिनेश यादव, राममूर्ति, दिलीप कुमार, रविशंकर, दशरथ मिश्र, सचिदानंद, आरती, सुनील तिवारी, राजकुमार पांडेय, दीपक पाठक, अभिषेक उपाध्याय आदि मौजूद थे।