जौनपुर। सुल्तानपुर जिले के एक झील से निकलकर बदलापुर इलाके के मई गांव में गोमती नदी समाहित होने वाली पीली नदी सूख गई है। इस नदी में न तो पानी है और न ही शासन प्रशासन पानी का कोई इंतजाम ही कर रहा है। नदी में पानी नहीं होने की वजह से आसपास के गांव में भूजल का स्तर नीचे तेजी से जा रहा है। यूं कहा जाए कि नदी के अस्तित्व पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। अगर प्रशासन ने इस पर ध्यान नहीं दिया तो नदी की भूमि पर लोग काबिज हो जाएंगे और इसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। वैसे भी यह नदी सिर्फ कहने की नदी रह गई है।
पीली नदी में माह मार्च से ही पानी सूखना शुरू हो गया था। यह नदी हाटा होती हुई खसरे गाँव आती है। जहां पहली बार इसमें एक छोटा नाला मिलता है। इसके बाद यह नदी बेलौना से भाटपट्टी गौसपुर होकर सैफाबाद पहुँचती है। यह नचरौला, दियावाँ, बरचौली होकर जौनपुर जनपद के केवटली गाँव आती है। आगे विनयका, डेहुणा, एकडला, दयालापुर, लालगंज, आहोपुर, सिरकिना, बहुर होते हुए करनपुर गांव में आती है। जहां तमूरा नाम की एक अन्य सहायक नदी मिलती है। तब यह पहितियापुर, खजुरन, फत्तूपुर, मरगूपुर, ऊदपुरगेल्हवा, चकमोलनापुर होते हुए रारीकला गाँव में लखेश्वरी नदी में मिलती है। वहीं से आगे जाकर दरियावगंज में पहुंच कर गोमती नदी में मिल जाती है। इस प्रकार पीली नदी का प्रवाह क्षेत्र सुल्तानपुर, प्रतापगढ़ तथा जौनपुर जिले के कुछ भागों में फैला हुआ है। किंतु समुचित जल प्रबंधन न होने के कारण यह नदी गर्मी में सूख जाती है। क्षेत्रवासियों ने शासन प्रशासन से पीली नदी में पानी छोड़वाए जाने की माँग किया है। ग्राम लौकरिया ऊदपुरगेल्हवा निवासी पूर्व प्राचार्य डा. लालजी शुक्ल का कहना है कि पिछले चार छ: साल से बारिश कम होने के कारण नदी नाले तो सूख रहे हैं किंतु नहरों में भी पानी नहीं आ रहा है। नहरों में यदि भरपूर पानी रहता तो नदी में पानी छोड़कर जल स्तर सही करने के साथ ही पशु पक्षी को पीने का पानी आराम से मिल जाता। नदी में पानी न रहने के कारण कृषि कार्य भी प्रभावित हो रहा है। फत्तूपुर निवासी भूगोल विभाग के पूर्व प्राध्यापक डा. सीबी सिंह का कहना है कि पीली नदी का अस्तित्व बचाने में शासन प्रशासन नाकामयाब है। यदि यही स्थिति रही तो आने वाले दिनों में जन मानस तथा पशु पक्षियों के जन जीवन पर खतरा का प्रबल संभावना बना हुआ है। ग्राम दुगौली निवासी शिक्षक बाबूराम यादव का कहना है कि कस्तूरीपुर में लाखों रुपए की लागत से बना चैकडेम साल भर भी नहीं चल सका। नदी में पानी न रुकने का यह सबसे बड़ा कारण है। ऐसी ही स्थित कमोबेश सभी चैकडैम की बनी हुई है।