मछलीशहर। फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी से लेकर होलिका दहन तक की अवधि को शास्त्रों में होलाष्टक कहा गया है। अर्थात होली से पहले के आठ दिन होलाष्टक यानी होली के रंगारंग पर्व के आगमन की सूचना देता है। होलाष्टक में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता है। इन दिनों किसी भी संस्कार को संपन्न करने के लिए शुभ नहीं माना गया है। होलाष्टक की यह परंपरा उत्तर भारत में अधिक निभाई जाती है। दक्षिण भारत में यह कम ही देखने को मिलती है। होलाष्टक के आठ दिनों में शुभ कार्यों की वर्जना के ज्योतिष और पौराणिक दोनों ही कारण माने गए हैं।
पं. देवीप्रसाद मिश्र कहते हैं कि होलाष्टक दान करने की दृष्टि से भी शुभ दिन हैं। पं. मुरारी श्याम पांडेय बताते हैं कि कामदेव ने भगवान शिव का तप भंग किया तो शिव ने उन्हें भस्म कर दिया था। यह फाल्गुन की अष्टमी को हुआ था। कामदेव की पत्नी रति ने शिव की आराधना की और अपने पति को पुनर्जीवित कराया। रति को आशीर्वाद मिलने के बाद ही धुलेड़ी हुई। होली से पूर्व के आठ दिन रति व कामदेव के विरह के दिन हैं। इसलिए शुभ कार्य नहीं होते हैं।
टीपी त्रिपाठी कहते हैं कि होली के पहले के आठ दिनों में प्रह्लाद को काफी यातनाएं दी गई थीं। प्रह्लाद को मिलने वाली यातनाओं से भरे इन आठ दिनों को अशुभ माना गया है। होलाष्टक में शुभ कार्यों के निषेध का ज्योतिष कारण भी तर्कसंगत है। ज्योतिषी शैलेश मोदनवाल के अनुसार, अष्टमी को चंद्रमा, नवमी तिथि को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र और द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल तथा पूर्णिमा को राहु उग्र स्वभाव के हो जाते हैं। इन ग्रहों के निर्बल होने से मनुष्य की निर्णय क्षमता क्षीण हो जाती है। इस कारण मनुष्य अपने स्वभाव के विपरीत फैसले कर लेता है। ऐसा न हो इसी कारण इन आठ दिनों में उसे किसी भी तरह के शुभ कार्य का फैसला लेने से मना किया गया है। इन आठ दिनों में मन की स्थिति अवसादग्रस्त रहती है। इसीलिए उसे अवसाद से उबारने के लिए इन आठ दिनों में रंगों की आमद हो जाती है। उसके मन में उल्लास लाने और वातावरण को जीवंत बनाने के लिए रंगों का प्रयोग विभिन्न तरीकों से किया जाता है। कुछ स्थानों पर तो होलाष्टक के आठ दिनों में होली मनाई जाती है या होली के रंग किसी न किसी रूप में बिखरने लगते हैं। होलाष्टक के आठ दिनों को व्रत, पूजन और हवन की दृष्टि से अच्छा समय माना गया है।