शाहगंज। सप्ताह भर तक चलने वाला ऐतिहासिक चूड़ी मेला शनिवार को शुरू हो गया। पहले दिन ही मेले में महिलाओं की भीड़ उमड़ पड़ी। महिलाओं ने रंग-बिरंगी चूड़ियों की खरीदारी की। यहां चूड़ी मेला 150 वर्षों से लगातार लगता चलता आ रहा है।
मेले के बारे में मान्यता है लंका पर विजय के बाद माता सीता और भाई लक्ष्मण के साथ अयोध्या वापसी के बाद माता सीता ने अपनी सहेलियों के साथ शृंगार हाट पहुंचकर खरीददारी की थी। ऐसे में यह मेला महिलाओं के लिए शुभ का प्रतीक माना जाता है। विजयादशमी के पर्व के एक सप्ताह के बाद नगर में चूड़ी मेले का आयोजन किया जाता है। मेले में पूर्वांचल के विभिन्न जनपदों से के व्यापारी आकर यहां दूकान लगाते हैं। मेले में बड़ी संख्या में महिलाएं खरीदारी करती हैं। यह मेला करीब सप्ताह भर चलता है। इस मेले में पुरुष का प्रवेश का वर्जित होता है। सुरक्षा के लिए पुलिस बल की तैनाती होती है। साथ ही रामलीला समिति के कार्यकर्ता भी मेले पर नजर रखते हैं। लीला प्रमुख इंदुनाथ पांडेय उर्फ बैजू महाराज बताते हैं कि लंका पर विजय के बाद जब प्रभु श्रीराम भाई लक्ष्मण और माता सीता के साथ अयोध्या पहुंचे। इसके बाद माता सीता ने अपनी सहेलियों के साथ शृंगार हाट पहुंचकर खरीदारी की थी। यह मेला उसी की याद दिलाता है। इस मेले में क्षेत्र के अलावा आजमगढ़, अंबेडकरनगर और सुल्तानपुर की महिलाएं बड़ी संख्या में पहुंचकर खरीददारी करती हैं। जिस मोहल्ले में मेला लगता है, उसका नाम ही चूड़ी मोहल्ला पड़ गया। मेले को लेकर महिलाओं में उत्साह रहता है। यह मेला अपने आप में अनोखा और अलबेला है। मेले में चूड़ी, कंगन, क्राकरी के बर्तन, सौंदर्य प्रसाधन, हैंडबैग, चप्पल आदि की दूकानें लगती हैं। इसके अलावा चाट, पकौड़े आदि की दुकानों पर महिलाओं को अपनी सहेलियों से मिलने का मौका मिलता है। खास बात तो यह है कि मेला गंगा जमुनी संस्कृति की मिसाल भी है। इसमें सभी समुदायों की महिलाएं हिस्सा लेती हैं।