उरई/मुहम्मदाबाद। अन्ना पशुओं से परेशान किसान अब दलहनी फसलों में चना, मटर, मसूर आदि में इल्ली के प्रकोप से परेशान हैं। इल्ली पौधे के साथ फली में भी छेद कर उसे खा जाती है। इससे फसलों में बड़ा नुकसान होता है। किसान इल्ली से बचाव के लिए तमाम कवायद करते नजर आ रहे हैं। उन्होंने पैदावार की गिरावट की आशंका जताई है।
कृषि वैज्ञानिक भी कहते हैं कि यदि समय रहते इल्ली का प्रकोप नहीं रोका गया तो फसल की पैदावार में 10 से 90 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है। किसानों को इससे सचेत रहना चाहिए। समय रहते इल्ली नाशक दवाओं का छिड़काव करना चाहिए।
बड़ागांव निवासी किसान रबिश का कहना है कि उन्होंने बीस बीघा में मटर की फसल की बुवाई की थी। फसल अच्छी पक रही थी कि इसी बीच इल्ली का प्रकोप आ गया। वह दो बार दवा भी लगा चुके है लेकिन अभी तक इल्ली पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।
इमिलिया निवासी गोकुल प्रसाद का कहना है कि उन्होंने सात बीघा खेत में चना की फसल बोई है। फसल अभी फूल रही है लेकिन फूल के साथ इल्ली का भी प्रकोप शुरू हो गया है। जैसे जैसे फूल बढ़ रहा है, इल्ली भी बढ़ रही है। दवाओं का छिड़काव भी असर नहीं हो रहा है।
उसरगांव निवासी जिबराइल का कहना है कि उन्होंने विकास वैराइटी की सफेद मटर की बुवाई की है। मटर में इल्ली इतनी तेज है कि उन्होंने तो बार मटर की सिंचाई भी कर दी है लेकिन इल्ली का प्रकोप कम नहीं हुआ है। मटर पैदावार गिरने की संभावना है।
मड़ोरा निवासी अखिलेश राठौर का कहना है कि उन्होंने करीब 13 हजार रुपये क्विंटल के हिसाब से दंतेवाड़ा का महंगा बीज खरीदा था। शुरू में इल्ली नहीं थी लेकिन अब धीरे-धीरे पूरे खेत में इल्ली दिखाई दे रही है। अब समझ में नहीं आ रहा है कि कौन से दवा का छिड़काव करें।
कृषि वैज्ञानिक राजीव कुमार सिंह ने बताया कि इल्ली से बचाव के लिए डाईक्लोरोवाश, ट्राइजोफास, क्यूनालफॉस जैसी दवा को साढ़े तीन सौ से लेकर चार सौ लीटर पानी में घोलकर प्रति एकड़ की दर से डेढ़ सौ लीटर पानी का छिड़काव करें। साथ ही खेतों में खरपतवार न पनपने दें।