मुहम्मदाबाद। 35 लंच पैकेट, 60 समोसे, 13 बोतल पानी के दाम अचानक से जोड़कर बताना, किसी पढ़े लिखे व्यक्ति के लिए तो आसान हो सकता है लेकिन यह गणित जब कोई आठवीं पास महिला आपके सामने लगाकर दाम वसूले तो थोड़ी हैरत जरूर होगी।
हैरत में डालने वाली यह महिला है डकोर ब्लॉक के कुसमिलिया गांव की माया देवी, जो कि पिछले एक साल से विकास भवन में न सिर्फ अपनी ‘प्रेरणा’ कैंटीन चला रही है बल्कि अपने समूह की महिलाओं को भी स्वावलंबी बनाने के प्रयास में जुटी हैं। आज माया और उनकी कैंटीन दूसरी जरूरतमंद महिलाओं के लिए किसी प्रेरणा से कम नहीं है।
करीब 45 वर्षीय माया देवी ने बताया कि पति रामकृष्ण के हिस्से में चार बीघा खेती है, उसी से दो बेटों, एक बेटी का पालन पोषण हो रहा था। थोड़ी दिक्कत हुई, उसी वक्त गांव में तत्कालीन एडीओ सुदामाशरण आए और उन्होंने समूह बनाने के लिए प्रेरित किया। परिवार के लिए कुछ कर गुजरने की बात दिल को लगी और फिर 10-11 महिलाओं को साथ लेकर लक्ष्मी सहायता समूह बना लिया।
तब तक घर बैठे बैठे ही हम महिलाओं ने छोटे छोटे रोजगार जैसे चिप्स, पापड़, सिलाई आदि का काम शुरू किया। इसी बीच बीडीओ हो चुके सुदामाशरण ने ही विकास भवन में कैंटीन खोलने का प्रस्ताव सुझाया। फिर क्या था, समूह की मदद से बीस हजार रुपये का इंतजाम किया और साल 2018 की 10 जनवरी को खुल गई विकास भवन के गेट के पास लक्ष्मी सहायता समूह की प्रेरणा कैंटीन।
जिसका उद्घाटन स्वयं जिलाधिकारी मन्नान अख्तर ने ठीक आज से एक साल पहले किया था। अब कैंटीन में समूह की कुछ महिला पूड़ी बेलने, सब्जी बनाने का काम करती है और कुछ अन्य समूह की महिलाएं कैंटीन के लिए दोना, पत्तल, थर्माकोल के बर्तन, दरिया, बेसन आदि उपलब्ध कराकर रोजगार की धारा से जुड़ रही हैं।
सास का साथ और परिवार ने बढ़ाए हाथ
माया ने बताया कि कैंटीन खोलने का प्रस्ताव मिलते ही लगा कि परिवार विरोध करेगा लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। घर में बातचीत की तो सबसे पहले उनकी सास राजाबाई ने ही हिम्मत दिलाकर उनको आगे बढ़ाया और अब पति के साथ बेटा आदित्य भी काम में हाथ बटा रहा है।
सरकारी कर्मी भी बन रहे मददगार
माया के मुताबिक जब कभी कैंटीन में कोई नहीं होता है तब कुछ सरकारी कर्मी भी उनकी चाय और नाश्ता अधिकारियों की टेबल तक पहुंचाकर उनकी मदद करते हैं। कर्मियों का कहना है कि कैंटीन न होने से उन्हें भी तो परेशानी होती थी।