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विसरा तो सुरक्षित पर रिपोर्ट कौन की कौन कहे ं

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एसपी डॉक्टर सतीश कुमार - फोटो : ORAI
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उरई (जालौन)। तीन साल के भीतर पुलिस के कागजों से निकली 375 लोगों की मौत की वजह का कुछ पता नहीं है। यह वे मौतें हैं, जिनके बारे में मरने वालों के अपने भी अभी तक अंजान है। फिर पुलिस की कौन कहे। बात हो रही है कानूनी प्रक्रिया तहत होने वाली विसरा जांच रिपोर्ट की, जिससे मरने वाली मौत का कारण स्पष्ट किया जाता है।
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जनपद के पोस्टमार्टम हाउस के सूत्रों की मानें तो साल 2017 (उपलब्ध रिकार्ड के मुताबिक) से अब तक करीब 375 लोगों की मौत के बाद उनके विसरे जांच के लिए भेजे गए हैं। यह विसरे अब संबंधित थाने की पुलिस ही जांच के लिए भेजती है। यह बात और है कि जांच कितने दिनों में पूरी हुई या फिर उनकी क्या रिपोर्ट आई, इस बात की जानकारी स्वयं किसी भी थाना पुलिस को स्पष्ट नहीं है। जिसके चलते कहा जाए कि विसरा सुरक्षित रखे जाने का मतलब मौत का राज ही दफन होना हो गया है तो शायद गलत न होगा।
तस्वीर का एक पहलू यह भी है कि कई विसरे जांच के लिए भेज तो दिए जाते हैं लेकिन उनकी रिपोर्ट पूरी होते होते या तो थानेदार का तबादला हो जाता है या फिर परिजन भी खामोश होकर बैठ जाते हैं। अधिकांश मामलों में विसरा की रिपोर्ट आने से पहले ही यदि दो पक्षों के बीच कोई विवाद का मामला हुआ तो उनमें समझौता कर केस ही खत्म कर दिया जाता है। फिर पुलिस या परिजनों में से किसे पड़े कि वे मरने वाले की मौत का कारण जाने। पुराने मामलों की बात छोड़े करीब डेढ़ माह पूर्व कुठौंद थाना क्षेत्र में होटल संचालक ने सूदखोरों से तंग आकर जहर खाकर जान दे दी थी। जिसमें उसका सुसाइड नोट भी पुलिस को मिला था।
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पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण स्पष्ट न होने से विसरा जांच के लिए भेज दिया गया था। अभी तक न तो ई रिपोर्ट ही आई है और न ही थाने में किसी भी तरह की एफआईआर ही दर्ज की गई है। सूत्रों की मानें तो एफआईआर के लिए परिजनों की ओर से ही कोई प्रयास नहीं किया जा रहा है। इसी तरह लगभग डेढ़ साल पूर्व कोंच थाना क्षेत्र में बंद कमरे में पति पत्नी के सड़े हुए शव मिले थे। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण स्पष्ट नहीं हुआ था। इस कारण विसरा जांच के लिए भेजा गया था। हैरत की बात तो यह है कि विसरा रिपोर्ट आज तक नहीं आई और पुलिस मामले में एफआईआर भी लगा चुकी है। लगभग यही हाल अधिकांश उन विसरा रिपोर्टों का है, जिन्हें जांच के लिए भेजा तो गया लेकिन फिर उनका हुआ, इसका पता किसी को नहीं है।
सीएमओ अल्पना बरतरिया न कहा कि पोस्टमार्टम के वक्त यदि डॉक्टरों को मौत का कारण स्पष्ट नहीं होता है तो वे तत्काल ही शव लेकर आए पुलिस कर्मी को विसरा सुपुर्द कर दिया जाता है। फिर उसे संबंधित थाना ही जांच के लिए भेजता और उसकी रिपोर्ट भी थाने ही आती है। पोस्टमार्टम हाउस में फिलहाल विसरा रखने की कोई व्यवस्था नहीं है और न यहां रिपोर्ट की ही जानकारी होती है। एसपी डॉ सतीश कुमार ने कहा कि ऐसा नहीं है कि जांच के लिए भेजे गए विसरा की रिपोर्ट देखी ही नहीं जाती है। यह बात जरूर है कि अक्सर रिपोर्ट आने में देरी जरूर हो जाती है, 2-3 महीनों के बजाए 5-6 महीनों का भी वक्त लग जाता है लेकिन आती जरूर है और उस पर कार्रवाई भी होती है। दो तीन दिन पहले ही रामपुरा थाने के मामले में युवक का शव इटावा में ट्रक के पास संदिग्ध हालात में मिला था, जिसकी विसरा रिपोर्ट में जहर की पुष्टि हुई है। लिहाजा विवेचक आगे की जांच गंभीरता से कर कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं।
कब होती है विसरा जांच
शराब से हुई मौत, जहरखुरानी या फिर ऐसा मामला जिसमें मौत का कारण स्पष्ट नहीं हो सके। इनके खुलासे के लिए विसरा जांच कराई जाती है। छोटी आंत, आंत लीवर, गुर्दे को जांच के लिए भेजा जाता है। झंझटों से बचने के लिए अधिकांश मामलों में विसरा परीक्षण के लिए भेजा नहीं जाता है।
क्या करती है पुलिस
-पुलिस केस में पोस्टमार्टम की रिपोर्ट तो लगा देती है साथ विसरा सुरक्षित रखने की बात भी लिख देती है। लेकिन जांच रिपोर्ट सालों तक कोर्ट में पेश नहीं की जाती। कई बार पीड़ित और आरोपी पक्ष के बीच समझौता हो जाता है। नियमानुसार पुलिस को विसरा तीस दिन के अंदर फोरेंसिक लैब में भेज देना चाहिए, लेकिन ऐसा होता नहीं है।
प्रदेश में जांच के लिए दो लैब हैं
-विसरा जांच के लिए प्रदेश के आगरा व लखनऊ में ही फोरेंसिक लैब है। ऐसे में इन पर काफी भार है। सूत्रों की मानें तो विसरा जांच के लिए भेजे जाते हैं। उनमें से कुछ को छोड़ दें तो बाकी की रिपोर्ट लटक जाती है। इनको पाने के लिए महकमा लैब के बीच रिमाइंडर का दौर शुरू हो जाता है।

सी एम ओ अल्पना बरतरिया- फोटो : ORAI

पोस्टमार्टम हाउस से बिसरा ले जाता सिपाही- फोटो : ORAI

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