उरई। नगर और जिले के विभिन्न हिस्सों में जल संस्थान से स्थापित पानी की टंकियों की सफाई पिछले दो-तीन साल से नहीं हुई है। हालांकि, कोंच स्थित एक टंकी की सफाई बीस साल से नहीं करवाई गई। इसका असर अब टंकियों और नलकूपों पर स्पष्ट रूप से दिखने लगा है।
कहीं टंकियों से गंदा पानी आ रहा है, तो कहीं नलकूपों की कार्यप्रणाली प्रभावित हो रही है। जिले में जल संस्थान की कुल 65 पानी की टंकियां स्थापित हैं, जिनमें से 25 शहरी क्षेत्रों में और 40 ग्रामीण इलाकों में हैं। इन टंकियों से करीब 85 हजार लोगों को पानी की आपूर्ति की जाती है। इससे विभाग को प्रतिवर्ष लगभग 5 से 6 करोड़ रुपये का राजस्व भी प्राप्त होता है। बावजूद इसके टंकियों की सफाई सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई है।
एक टंकी की सफाई पर लगभग 15 से 20 हजार रुपये खर्च होते हैं। अगर इसमें मरम्मत व रंगाई- पुताई जोड़ें तो खर्च एक लाख के करीब पहुंचता है। बावजूद इसके सफाई मानकों के अनुरूप नहीं होती, जिससे नलकूपों की मोटरें खराब हो रही हैं और गंदा पानी घरों तक पहुंच रहा है। विभाग का दावा है कि सफाई कार्य शीघ्र शुरू किया जाएगा, जिसमें टंकियों की सफाई, ब्लीचिंग पाउडर का छिड़काव, नलकूपों की मरम्मत और अन्य उपकरणों की जांच की जाएगी। लेकिन, अप्रैल का पहला सप्ताह बीतने के बाद भी ये सब बातें केवल आश्वासन तक सीमित हैं।
जलसंस्थान के अधिशासी अभियंता सोमप्रकाश ने कहा कि कोंच में टंकी की सफाई तो हुई है, लेकिन तारीख नहीं बदली गई। अप्रैल में टंकियों की सफाई के लिए विशेष अभियान चलाया जाता है। इस बार भी अभियान जल्द शुरू किया जाएगा। किसी तरह की लापरवाही नहीं बरती जाएगी। नगर सहित ग्रामीण क्षेत्रों की सभी टंकियों की सफाई कराई जाएगी।
सफाई के दौरान इन कामों को कराता है विभाग
टंकी के अंदर जमी गाद, काई, और अन्य जमा पदार्थों को हटाना। इसके लिए मैन्युअल स्क्रबिंग या उच्च दबाव वाले जल प्रवाह का उपयोग किया जाता है। बैक्टीरिया और अन्य सूक्ष्म जीवों को नष्ट करने के लिए क्लोरीन या ब्लीचिंग पाउडर जैसे रसायनों का उपयोग किया जाता है। यह जल को रोगाणु-मुक्त बनाता है। टंकी की दीवारों में दरारें, रिसाव या अन्य कमियों को दूर किया जाता है, ताकि समय पर मरम्मत की जा सके। जल प्रवाह के लिए जिम्मेदार पाइपों की सफाई और उनकी कार्यक्षमता की पुष्टि करते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में सफाई सिर्फ दिखावा
जलसंस्थान के एक्सईएन सोमप्रकाश का दावा है कि हर वर्ष सभी टंकियों की सफाई करवाई जाती है, लेकिन वास्तविकता इसके अलग है। ग्रामीण इलाकों में वर्षों से टंकियों की सफाई नहीं हुई है। केवल एक-दो दिन रंगाई-पुताई और ब्लीचिंग पाउडर डालकर बजट को खपा दिया जाता है। इसको लेकर ग्रामीणों ने कई बार विरोध भी दर्ज कराया है। टंकियों पर सफाई की तारीखें भी सालों पुरानी लिखी हुई हैं। कोंच क्षेत्र में भी यही स्थिति है। विभाग पुरानी तारीख डालकर सफाई का दावा कर रहा है।
हर साल 15 से 20 लाख रुपये होते हैं खर्च
जलसंस्थान द्वारा टंकियों की सफाई के नाम पर हर साल 15 से 20 लाख रुपये खर्च किए जाते हैं। वहीं चार से पांच साल में इन टंकियों की मरम्मत और रंगाई-पुताई का भी काम किया जाता है। तब बजट 50 से 55 लाख रुपये पहुंच जाता है। दावा है कि कुछ टंकियों की सफाई कम बजट में भी हो जाती है। जिले में लगभग 90 से 95 नलकूप भी कार्यरत हैं, जिनकी मरम्मत और देखभाल के लिए अलग से बजट स्वीकृत होता है। इन नलकूपों की मरम्मत पर 15 से 20 लाख रुपये तक खर्च हो जाते हैं। इसके बावजूद विभाग का हर साल यही रोना रहता है कि मरम्मत के लिए पर्याप्त बजट नहीं है।