उरई (जालौन)। जनपद में कांग्रेस सपा का गठबंधन ही समाजवादी पार्टी के लिए नुकसानदायक साबित हुआ। कद्दावर नेताओं को सपा ने दरकिनार कर कालपी व माधौगढ़ की सीट कांग्रेस को दी तो वहीं, उरई सीट पर नामांकन के अंतिम दिन टिकट बदलना भी पार्टी को महंगा पड़ा। राजनीतिज्ञों की मानें तो टिकट कटने से नाराज सपा बागियों को संगठन ने मनाने का भी कोई प्रयास नहीं किया। यही वजह थी कि टिकट मांगने वाले सपा के दावेदार गठबंधन के बाद कहीं प्रचार में भी नजर नहीं आया। इसका परिणाम यह रहा कि गठबंधन की दोनों सीटों पर पार्टी तीसरे नंबर पर रही और उरई सीट पर भी वोटों का अंतर एतिहासिक रहा। सपा के सूत्रों की मानें तो पार्टी हाईकमान अब इस पर मंथन कर जल्द ही संगठन में भी फेरबदल कर सकता है।
पिछले छह माह से कालपी, माधौगढ़ व उरई सीट पर सपा के दावेदार अपनी पूरी ताकत झोंके थे। इनमें कुछ दावेदार मुलायम सिंह और शिवपाल खेमे के भी थे, लेकिन जैसे, जैसे मुलायम परिवार में कलह बढ़ती गई, दावेदारों का दावा भी सीट पर कमजोर होता चला गया। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के हाथ में बागडोर आई और आचार संहिता लगते ही टिकटों में फेरबदल शुरू हो गया। इसके बाद गठबंधन बीच में कूदा तो पार्टी से जुडे़ बडे़ नेताओं ने इसका विरोध किया, पर चली किसी की नहीं।
पार्टी हाईकमान के फैसले पर कालपी और माधौगढ़ की सीट से सपा का दावा करने वालों को एक झटके में ही किनारे कर दिया गया और दोनों सीटें कांग्रेस के उम्मीदवार को सौंप दी गईं। जबकि उरई सीट पर तो नामांकन के अंतिम दिन और घंटों में ही सिटिंग विधायक दयाशंकर का टिकट काटकर महेंद्र कठेरिया को प्रत्याशी बनाया गया। इसके बाद शुरू हुआ सपा, कांग्रेस गठबंधन का चुनाव प्रचार। इसे सपा की चूक कहा जाए या नासमझी कि प्रचार के वक्त रूठों को मनाने का कोई प्रयास नहीं हुआ। इस कारण गठबंधन के प्रत्याशियों से सपा के दावेदारों ने दूरी ही बना रखी। माना जा रहा है कि यही एक मात्र वजह है कि सपा का गठबंधन कालपी और माधौगढ़ में तीसरे नंबर पर तो उरई में 78511 वोटों के अंतर से दूसरे स्थान पर रहा। पार्टी नेताओं के मुताबिक सीटों का गठबंधन तो हुआ, लेकिन पार्टी वोटों का भी गठबंधन कराने में असफल रही। जल्द ही इस पर मंथन किया जाएगा।