बुंदेलखंड में पिछले पांच सालों से दैवी आपदा से पीड़ित किसान साहूकारों के
कर्ज के जाल में फंसता दिखाई दे रहा है। हालत ये है कि कुछ हजार रुपये का
कर्ज चंद महीनों में लाखों तक पहुंच गया। असल से ज्यादा सूद चुकाने में
लाचार किसान की हिम्मत ही टूटने लगी। इसके चलते अब तक कई लोगों ने जिंदगी
का साथ छोड़ दिया तो कई किसान अपनी पुश्तैनी
जमीन बेचकर मजदूरी करने तक को
मजबूर हो गए। अपनी दास्तां सुनाते वक्त आज भी उनकी आंखों में आंसू झलक
पड़ते हैं। वहीं, साहूकारी कर रहे गांव के दबंग किसानों पर जुल्म भी ढाने
लगे हैं। कभी ये घर पर आकर गालीगलौज करते हैं तो कभी जमीन और मकान पर कब्जा
करने की धमकी। इससे गांव के किसान खुद को असहाय महसूस कर रहे हैं।
केस 1-
डकोर के गांव कुसमिलिया निवासी
श्याम सिंह पुत्र जमुनादास ने बताया कि उनके पास छह बीघा जमीन थी। पांच
साल लगातार फसल बर्बाद होने पर उन्होंने पहले किसान क्रेडिट कार्ड, फिर
बैंकों और आखिर में गांव के एक साहूकार से खेत की जुताई-बुवाई और पानी के
लिए कर्ज लिया। इसी बीच दो पुत्रियों माध्वी और सुनीता की शादी भी करनी
पड़ी। इससे वे कर्ज
में डूबते ही चले गए। नम आंखों से श्याम सिंह बताते हैं
कि इन सब परिस्थितियों के बीच उन पर 10 लाख का कर्ज हो गया। इसे चुकता
करने के लिए उन्हें अपनी जमीन तक बेचनी पड़ी। आज उन्हें अपने परिवार के
पालन पोषण के लिए चाय-नाश्ते की छोटी सी दुकान चलाना पड़ रहा है।
केस 2-
मुहम्मदाबाद
निवासी फूल सिंह राजपूत पुत्र रामसहाय की भी कहानी श्याम सिंह से अलग नहीं
हैै। वे 11 बीघा जमीन के मालिक हैं। इसके अलावा कुछ जमीन पेशगी पर भी लेकर
खेती करते थे। चार-पांच साल से दैवी आपदा से खेती में उन्हें तगड़ा नुकसान
हुआ। मांगने पर गांव के साहूकारों ने उन्हें बड़ी रकम दे दी। कर्ज से
छुटकारे के लिए हरी मटर का भी
व्यापार किया। उसमें भी नुकसान हुआ। इसके बाद
छत्रसाल ग्रामीण बैंक शाखा मुहम्मदाबाद से डेढ़ लाख का केसीसी बनवाया।
कुसमिलिया सहकारी समिति बैंक से 80 हजार का कर्ज खाद, बीज के लिए ले लिया।
कर्ज से उबरने के लिये 5
बीघा जमीन साहूकारों के पास गिरवी रख दी। इसके बाद
भी न तो साहूकारों और न ही बैंक का कर्ज चुका पा रहे हैं। हालत ये हो गई
कि अब गांव से दूध इकट्ठा कर शहर में जाकर फेरी लग रहे हैं।
छोटे किसानों के वश की नहीं रही खेती
अतिवृष्टि
तो कभी सूखे ने किसानों का खेती से मोह भंग कर दिया है। इससे छोटे किसानों
के वश की अब खेती नहीं रही। किसान प्रेमनरायन वर्मा, हनीफ खां, नृपत
अहिरवार, दारा सिंह आदि ने बताया कि पहले वे लोग दो से चार बीघे में गुजारा
कर लेते थे, मौसम भी साथ देता था। अब संसाधनों के अभाव में इतनी खेती में
गुजारा नहीं हो पाता। जुताई, बुबाई, खाद, बीज में लागत के बावजूद उत्पादन
मूल्य तक नहीं निकल पाता।