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तप से मानव की उन्नति -हरिसिद्ध शरण

Wed, 18 Nov 2015 11:18 PM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, उरई
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मानव जीवन में तप का बहुत महत्व है। तप का तात्पर्य शारीरिक कष्ट सहकर भी सत्कर्म करना तथा दूसरों का हित करना है। जो व्यक्ति तप नहीं करता, तो उसका तप का उल्टा पत अर्थात पतन हो जाता है। ये बात छोटी माता मंदिर के सामने स्थित पुराने अस्पताल परिसर में आयोजित श्रीराम कथा महोत्सव के प्रथम दिन रंग वाटिका अयोध्या से पधारे श्री श्री 1008 स्वामी
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हरिसिद्ध शरण जी महाराज अपनी अमृतमयी वाणी द्वारा श्रद्धालुओं को श्रीराम कथा का रसपान कराते हुए कही। कथावाचक ने  कहा कि तप का प्रथम अंग भोजन तथा निद्रा पर नियंत्रण करना है। उन्होंने बताया कि सप्ताह में एक या दो बार दिन में एक ही बार भोजन करें तथा अपने हिस्से के बचे हुए अन्न का किसी सुपात्र को दान कर देने से अनंत पुण्य का लाभ मिलता है।

इसके साथ ही समाज में समरसता की भावना को बल मिलता है। वहीं, श्री महाराज ने आज अपनी सरस वाणी के माध्यम से श्रोताओं को रामजन्म की कथा का श्रवण कराया। इस मौके पर कृष्ण माहेश्वरी, ऊषा मिश्रा, मालती निरंजन, लता शुक्ला, रामश्री सोनी, ऊषा रानी, स्नेहलता गुप्ता, केजी नारायण, रमेशचंद्र माहेश्वरी, रमेश हूंका, गिरीश गुप्ता, विमल राठौर आदि सहित सैकड़ों की संख्या में भक्तगण उपस्थित थे।
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