कदौरा। शनिवार से रमजान का महीना यानी बरकतों का महीनों शुरू हो रहा है। शायद यह पहली बार है जब उरई ही नहीं बल्कि कालपी, कदौरा और एट आदि मुस्लिम इलाकों की बाजारें खामोश और सड़कें सुनसान पड़ी है। न कहीं अरबी खजूर सजे नजर आ रहे हैं और न ही बड़ी-बड़ी कढ़ाई में लाल सिवईं पकती दिख रही है। टेलरों की मशीनें शांत और रेडीमेड के गोदामों में ताले पड़े हैं। इसके बाद भी रोजेदारों को मलाल नहीं है, कहना है कि लॉकडाउन है तो पालन भी किया जाएगा, क्योंकि किसी धर्म और मजहब के लिए बल्कि पूरे मुल्क की सलामती के लिए है। रही बात अरबी खजूर, सिवईं और लखनवीं परिधानों की तो ईद तक के हालात देखे जाएंगे, फिर ऐसा तो नहीं कि ईद दोबारा नहीं आएगी। आज वक्त जानलेवा बीमारी से छिड़ी जंग को जीतने का है तो पहले मुल्क से बीमारी को भगाना बेहद जरूरी है। प्रस्तुत है रोजेदारों से बातचीत पर आधारित खबर-
फल, दूध व ब्रेड से चलेगा काम
जाहिद अली का कहना है कि हर बार रमजान से पहले ही कानपुर, लखनऊ से सिवईं, सूतफेनी मंगा लेते थे, इस बार लॉकडाउन है तो सिर्फ फल व दूध ब्रेड के साथ ही सहरी व इफ्तार किया जाएगा। पहले महामारी से निपटना है, ईद तो हर साल आएगी।
कीमती कपड़े नहीं, जरूरतमंदों की करेंगे मदद
असलम दीवान के मुताबिक सोचा तो था कि इस बार कढ़ाईदार कुर्ता और राजस्थानी जूते पहनकर ईद मनाएंगे लेकिन इस महामारी ने देश को अपनी चपेट में ले लिया है, लिहाजा तय किया है कि अब उन्हीं रुपयों से गरीबों व जरूरतमंदों की मदद की जाएगी।
एकजुट होकर लड़ने का वक्त
कौशर बताती हैं कि परिवार के साथ इस बार लखनऊ से शापिंग करने का प्लान था लेकिन लॉकडाउन के कारण सब कैंसिल करना पड़ा। ठीक भी है, आज सारी दुनिया जब बीमारी से जूझ रही है तो यह वक्त खुशी मनाने का नहीं बल्कि एकजुट होकर संघर्ष का है।
मदद ही सिखाता है माहे रमजान
इकरा नाज का कहना है कि कानपुर से खरीदारी के लिए पापा से रुपये भी मिल गए थे लेकिन अब जिन रुपयों से कपड़े और दोस्तों को पार्टी देना का सोच रखा था, उनसे अब जरूरतमंदों को खाना खिलाएंगी, रमजान का महीना भी तो हमें दूसरों की मदद ही सिखाता है।
असलम- फोटो : ORAI
कौशर- फोटो : ORAI
इकरा- फोटो : ORAI
इस बार लाकडाउन के चलते मुस्लिम इलाकों की बाजारों में पसरा सन्नाटा।- फोटो : ORAI