उरई। ब्लड कैंसर की गंभीर हालत में पहुंच चुके मरीजों को स्वदेशी तकनीकी से विकसित की गई काइमेरिक एंटीजन रिसेप्टर टी सेल (सीएआरटी) थैरेपी को गुरुवार को राष्ट्रपति ने राष्ट्र को समर्पित किया। इस थैरेपी की खोज जालौन जिले के बीहड़ क्षेत्र रामपुरा के निवासी डॉ. राहुल पुरवार (45) ने की है।
यह थैरेपी काफी सस्ती और बेहद कारगर बताई जा रही है। थैरेपी की कीमत भारत में करीब 40 लाख है। जो ब्लड कैंसर के चौथी स्टेज के मरीजों पर भी चमत्कारिक असर कर रही है। अभी तक इस थैरेपी के लिए पीड़ित मरीजों को विदेश जाना पड़ता था, जिसकी वजह से यह थैरेपी करवाने में करीब पांच करोड़ का खर्च आता था। भारत में इस थैरेपी की शुरूआत हो जाने से ब्लड कैंसर रोगियों को काफी राहत मिल सकेगी।
ब्लड कैंसर की चौथी स्टेज पर पहुंच रहे रोगियों के लिए यह थैरेपी बेहद कारगर और सस्ती है। विदेशों में इस थैरेपी से इलाज कराने पर पांच करोड़ से ज्यादा खर्च हो जाता है। जबकि डॉ. राहुल पुरवार ने जो थैरेपी विकसित की है, वह काफी सस्ती है। इस थैरेपी में इलाज कराने में करीब 40 लाख रुपये खर्च आएगा। इस थैरेपी को बनाने वाली टीम के लीडर व आईआईटी मुंबई में सहायक प्रोफेसर डॉ. राहुल पुरवार बताते है कि जैव प्रोद्योगिकी उद्योग अनुसंधान परिषद (बाईरैक) एवं बायोटेक्नोलॉजी विभाग के सहयोग से चार जून 2021 को सीएआरटी सेल थैरेपी को विकसित किया था।
टाटा मेमोरियल अस्पताल और आईआईटी मुंबई में पहले इसका क्लीनिकल ट्रायल हुआ। इस थैरेपी का ट्रायल उन्होंने 18 लोगों पर किया था, इसमें छह बच्चे भी शामिल थे। गुरुवार को मुंबई आईआईटी में राष्ट्रपति द्रोपदी मूर्मू ने सीएआरटी टीसेल थैरेपी को राष्ट्र को समर्पित किया। इस समारोह में राज्यपाल रमेश बैस, टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के डॉयरेक्टर सुदीप गुप्ता, आईआईटी मुंबई के डॉयरेक्टर सुभाशीष चौधरी की मौजूदगी में यह समारोह हुआ। सभी ने इस थैरेपी की सराहना की।
फोटो-22 -डॉ. राहुल पुरवार
कौन हैं राहुल पुरवार
थैरेपी को भारत में स्वेदशी रुप में विकसित करने वाले डॉ. राहुल पुरवार जिले के रामपुरा नगर पंचायत क्षेत्र के निवासी हैं। उनकी इंटर तक की पढ़ाई रामपुरा के समर सिंह इंटर कॉलेज में हुई थी। उनके पिता डॉ. कैलाश नारायण प्राइवेट डॉक्टर हैं। राहुल ने स्नातक और परास्नातक की डिग्री लखनऊ से ली और इसके बाद शोध कार्य एम्स दिल्ली से किया। इसके बाद जर्मनी से पीएचडी की डिग्री हासिल की। फिर हावर्ड मेडिकल कॉलेज बोस्टन यूएसए से फेलोशिप की। साढ़े चार साल यूएसए में रहने के बाद दिसंबर 2013 में आईआईटी मुंबई में बायो साइंस एवं बायो इंजीनियरिंग विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में काम कर रहे हैं।