मोहम्मदाबाद। छुट्टा मवेशियों और मौसम की मार से हुई गेहूं और मटर की बर्बादी ने एक बीएड के विद्यार्थी को खेती में कुछ अलग करने की ऐसी प्रेरणा दी कि उसने दो हेक्टेयर से ज्यादा में 'थाई ग्रीन एपल बेर' के पौधे लगा दिए।
इस खेती में उसे प्रति वर्ष मटर और गेहूं के मुकाबले कई गुना ज्यादा मुनाफा हुआ तो आत्मविश्वास और बढ़ गया। हर साल करीब 20 टन तक बेर का उत्पादन हो जाता है।
डकोर के कुसमिलिया गांव के रहने वाले गीतेश राजपूत ने बीएड की पढ़ाई की है। खेत में मटर और गेहूं की फसल के नुकसान से दुखी होते पिता सुरेश चंद्र राजपूत को देख उसने अपना मन बदल लिया। खेती में ही भविष्य बनाने की ठान ली। गीतेश बताते हैं कि उन्होंने काफी खोजबीन की और बाजार की स्थिति को समझा। उसके बाद खेती से जुड़े कुछ प्रोजेक्ट तैयार किए और संबंधित विशेषज्ञों से भी फसलों के लिहाज से मिट्टी और वातावरण को भी समझा। उन्होंने ''थाई ग्रीन एपल बेर'' को लेकर फैसला लिया।
गीतेश बताते हैं कि यह बेर सबसे ज्यादा गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान व मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा होता है। वहां से यहां ट्रांसपोर्ट होने के कारण यह महंगा रहता है। उन्होंने इस प्रजाति के पौधे को वर्ष 2021 में पश्चिम बंगाल से मंगाया और दो हेक्टेयर से ज्यादा में लगाया। कुछ पौधे खराब हुए, जिन्हें बदला। उसके बाद जब वे फल देने के लिए तैयार हुए तो उसका लाभ सामने आया। बताया कि करीब 20 टन तक हर साल बेर आते हैं, मार्केट दाम के हिसाब से हर साल सात से आठ लाख रुपये तक के बिक जाते हैं।
अन्ना गोवंश से परेशान किसानों के लिए भी यह खेती काफी मुफीद है। पशु चिकित्सक अखिलेश सचान ने बताया कि बेर के पौधे की महक गाय को पसंद नहीं होती। इसलिए वह न ही बेर खाती है और न ही उसके पौधे खाती है। किसान गीतेश राजपूत बताते हैं कि सिर्फ नील गाय और बकरी से सुरक्षा करनी होती है।
गीतेश ने बताया कि एक पौधा करीब 250 रुपये का आया था। 800 पौधे की लागत दो लाख रुपये आई थी। एक बार लागत लगाने के बाद इन पौधों से 20 साल तक कृषि व्यापार कर सकते हैं। बाजार में होलसेल में 60 रुपये प्रति किलो के हिसाब से ये बेर बिक जाते हैं। औसतन यदि पांच लाख रुपये भी प्रति वर्ष की आमदनी मान लें तो भी 20 साल में एक करोड़ रुपये इसी खेती से मिल जाते हैं।