एक तरफ पौराणिक, धार्मिक स्थल जीर्णशीर्ण होकर अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं। वहीं, डकोर ब्लॉक के ग्राम कुसमिलिया में संवत 1623 ई. में बना प्राचीन राधाकृष्ण मंदिर आज भी स्वतंत्रता संग्राम का गवाह बना हुआ है। इसी मंदिर में स्वतंत्रता सेनानी बैठकर अंग्रेजों के खिलाफ योजनाएं बनाते थे। विशाल मंदिर में पुरानी कला और कारीगरी आज भी देखने योग्य
है। मंदिर के अंदर विशाल तलघर बना है। जिसमें जाने के लिए दस सीढ़ियां है। एक दरवाजा तलघर के लिए मंदिर के बाहर से और एक अंदर से है। मंदिर का निर्माण संवत् 1623 ई. में ग्राम कुसमिलिया निवासी लल्लू शाह एवं उनकी पत्नी मां शाह साहब ने कराया था। बताया जाता है कि ब्रिटिश शासन में क्षेत्र के कई स्वतंत्रता सेनानी इस मंदिर में पूजा-अर्चना के बहाने
इकट्ठा होकर मंदिर में बने तल घर में स्वतंत्रता संग्राम की रणनीति बनाते थे। मंदिर में राधाकृष्ण की मूर्ति के साथ हनुमान जी, शिव परिवार की मूर्तियां विराजमान हैं। मंदिर की
दीवारों, बाउंड्री में कई कलात्मक मूर्तियां स्थापित हैं। राधेश्याम पालीवाल, बृजेश पालीवाल मंदिर की देखरेख करते हैं। मंदिर की मरम्मत का कार्य एक सितंबर 2011 में कराया गया था। लल्लू शाह की पत्नी मां शाह साहब ने इस मंदिर का निर्माण कुछ इस तरह से कराया था कि वह सात सौ मीटर दूरी पर बने अपने घर में बैठ कर मंदिर के दर्शन कर लें।
सेनानियों की याद दिलाता है शिलालेख
इंटर कालेज कुसमिलिया में स्थापित शिलालेख के अनुसार क्षेत्र के स्वतंत्रता सेनानियों की संख्या 36 है। ये आज भी इस इंटर कालेज के छात्र/छात्राओं को स्वतंत्रता संग्राम और इसके लिए दी गई कुर्बानियों की जानकारी देता दिखता है।