खरीफ, रबी व जायद की फसलों को सुरक्षित करने के लिए चलाई जा रही फसल बीमा
योजना से किसान संतुष्ट नहीं हैं। बीमा की शिकायतों को लेकर किसान आला
अधिकारियों के पास पहुंच रहे हैं। माधौगढ़ और जालौन क्षेत्र के किसानों ने
किसान दिवस में भी बीमा क्लेम न मिलने का मुद्दा उठाया। कहा था कि उन्हें
बीमा का एक धेला भी नहीं मिला,
जबकि प्रीमियम पूरा जमा किया। क्राप कटिंग
की रिपोर्ट पर भी सवाल उठ रहे हैं। हालत यह है कि किसान बीमा कराने के बाद
अपने को ठगा सा महसूस करते हैं। वर्ष 2015 में करीब 55 हजार किसानों ने
खरीफ फसल का बीमा कराया था। क्लेम की बारी आई तो नियम कायदे समझाए जाने
लगे। बता दें कि बुंदेलखंड कई साल से दैवी आपदाओं से जूझ
रहा है। यहां
का किसान बेहद परेशान है। ऐसे में उसे फसल सुरक्षा के लिए बीमा कराने के
लिए प्ररित किया गया। कैंप लगाकर गैर ऋणी किसानों की फसल का बीमा किया गया।
बैंक से ऋण लेने वाले किसानों का पहले ही प्रीमियम काट लिया गया। जब फसल
में नुकसान हुआ और क्लेम की बारी आई तो किसानों को कुछ भी हाथ आते नहीं दिख
रहा है।
वर्ष 2015 में 55 हजार किसानों ने खरीफ फसल का बीमा कराया था।
इसका प्रीमियम भी बैंकों के माध्यम से जमा किया लेकिन नुकसान होने पर बीमित
किसानों को लाभ नहीं मिल रहा है। क्राप कटिंग रिपोर्ट के आधार पर 24 हजार
किसानों को क्लेम दिया जा रहा है। 34.18 करोड़ रुपये की धनराशि बैंकों को
बीमा कंपनी की ओर से भेज दी गई है।
इसके बाद से ही यह सवाल उठ रहा है कि
फसल का नुकसान तो अन्य किसानों का भी हुआ तो उन्हें लाभ क्यों नहीं मिला।
इस पर बीमा कंपनी ग्राम पंचायत को इकाई मानकर क्लेम देने का नियम बता रही
है। किसानों ने बीमा क्लेम को लेकर अधिकारियों का भी दरवाजा खटखटाया है
लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ है।
नुकसान के आंकलन का तरीका
फसल
का बीमा करने वाली कंपनी ग्राम पंचायत को इकाई मानकर क्लेम का निर्धारण
करती है। इसमें क्राप कटिंग कराई जाती है। इसके बाद बीते दस सालों में हुए
उत्पादन से मिलान कराया जाता है। बीते वर्षों में हुए उत्पादन से कम
उत्पादन हुआ तभी नुकसान माना जाता है। इस प्रक्रिया में समय भी खूब लगता है
जिससे किसानों को फसल नुकसान पर क्लेम की राशि भी समय से नहीं मिल पाती।
किसान को इकाई मानने की मांग है लंबित
नुकसान
पर भी क्लेम न मिल पाने की समस्या जब खड़ी हुई तो किसान संगठन भारतीय
किसान यूनियन, भारतीय किसान संघ ने ग्राम पंचायत को इकाई मानने का विरोध
किया और किसानों को ही इकाई मानने की मांग की। यह मांग दो साल से लंबित है।
इस दौरान किसानों को सूखा, अति वृष्टि व ओलावृष्टि जैसी आपदाओं का सामना
भी करना पड़ा।
किसानों की बात उन्हीं की जुबानी
- फसल का बीमा
कराने का मतलब है कि नुकसान पर क्लेम मिले लेकिन यहां पर तो किसानों के साथ
धोखा हो रहा है। खासकर जालौन और माधौगढ़ क्षेत्र के किसानों के साथ। बीमा
कंपनी ने खरीफ फसल का एक धेला भी क्लेम के रूप में नहीं दिया। इस मुद्दे को
किसान दिवस में भी रखा है।
विजय कुमार भैया जी, छिरिया सलेमपुर
-
प्रीमियम तो बीमा कंपनी पूरा वसूल करती है लेकिन क्लेम की बारी आती है तो
हाथ सिकोड़ लेती है। प्रीमियम जमा करने वाले किसान को नुकसान होने पर क्लेम
दिया जाए। ग्राम पंचायत को इकाई माना जाना न्याय संगत नहीं है। किसान के
खेत में खड़ी फसल का बीमा हुआ है तो नुकसान पर क्लेम उसको मिलना चाहिए।
सुभाष द्विवेदी, हरकौंती
-
बीमा कंपनी प्रीमियम बैंक के माध्यम से जमा करा लेती है। इसके बाद से
किसानों को कोई जानकारी नहीं मिल पाती। बीमा कंपनी का कोई अधिकारी जिले में
नहीं बैठता। क्राप कटिंग किसके खेत की कराई जाती है इस पर सवाल उठ रहे
हैं। अधिकारियों को भरोसे में लेकर बीमा कंपनी के मालिक किसानों को चूना
लगा रहे हैं।
रामप्रकाश, अकोड़ी वैरागढ़
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किसान इस समय दैवी आपदा से बुरी तरह आहत है। इस दौर में बीमा कंपनी किसानों
को फसल बीमा के नाम पर ठग रही है। बीमा का मतलब संबंधित के खेत में खड़ी
फसल से है न कि पड़ोसी की फसल से। प्रीमियम हम जमा कर रहे हैं तो नुकसान का
आंकलन पूरे गांव की रिपोर्ट पर क्यों। मुझे भी बीमा क्लेम नहीं मिला है।
महेंद्र सिंह, भिटारी