मुहम्मदाबाद। रमजान का आखिरी असरा मगफिरत का है। इस माह में जो भी दुआ मांगी जाती है, वह कुबूल होती है। यह बरकत वाला महीना है। कहा गया है रोजा रखने से बड़ी से बड़ी बीमारी ठीक हो जाती है। इस समय जहां कोरोना वायरस जैसी बीमारी से जहां पूरा देश लड़ रहा है वही बरकत माहे रमजान चल रहा है।
लॉकडाउन के चलते लोग अपने घर में ही नमाज तिलावत व तराहबीह घरों में ही पढ़ रहे हैं और इस महामारी जैसी बीमारी से ठीक करने के लिए दुआएं मांग रहे हैं। इस माह में एक नेकी करने से 70 गुना सवाब मिलता।
रहमानिया मस्जिद के पेश इमाम अंसार हुसैन कहते हैं कि फितरा न देने वालों की रोजा व नमाज कुबूल नहीं होती है। अगर बच्चा रमजान माह के दौरान पैदा हुआ है तो उस पर भी सदका फितरा वाजिब है। 2 किलो 45 गेहूं के बराबर रुपया प्रति व्यक्ति के हिसाब से इसे ईद की नमाज के पहले अदा कर देना चाहिए।
पीरों वाली मस्जिद के पेश इमाम अकरम रजा बोले कि इस माह में एक रात ऐसी है जिसमें लोगों को इबादत करना चाहिए। चांद की 27 तारीख को रात को लोगों को इबादत करनी चाहिए और गुनाहों के लिए अल्लाह से तौबा करें। इस रात गुनाहों से माफी मिल जाती है।
मौलाना कय्यूम ने बताया हर साहिबे निसाब पर जकात देना फर्ज है। जिसके पास साढ़े सात तोला सोना और साढ़े 52 तोला चांदी है। इसके अलावा दोनों चीजों के बराबर पैसा हो उस पर जकात निकालना फर्ज है। जकात कई तरीके से निकाली जाती है इसके लिए सबसे पहले अपने आसपास गरीब की मदद कर दो, फिर मोहल्ले, फिर गांव में मदद करें। बाद में कहीं मदरसे में या गरीबों में दे सकते हैं।
हाफिज अंसार हुसैन- फोटो : ORAI
हाफिज अकरम रजा- फोटो : ORAI