हरदयाल आज बेबस घर के दरवाजे पर बैठे हैं। एक दिन पूर्व उनकी पत्नी घसीटी (60) की इलाज के अभाव में मौत हो गई। परिजन इसे नोटबंदी का दंश बता रहे हैं जो अब उनके परिवार को मौत की शक्ल में चुभा है। हरदयाल अब कुुछ भी नहीं बोलना चाहते, व्यवस्था और समाज से उनका जैसे विश्वास उठ सा गया है। दरअसल, 14 नवंबर को उरई के ग्राम दौलतपुर
निवासी घसीटी पत्नी हरदयाल बाइक से झांसी के करगुआ से अपने घर लौट रही थीं। पिरौना के पास ढेरी की पुलिया के पास यह बाइक से उछलकर गिर गई थीं। इससे इनके सिर में गहरी चोट लगी थी। परिजनों ने उन्हें जिला अस्पताल भर्ती कराया जहां से डाक्टरों ने गंभीर हालत में उन्हें झांसी के लिए रेफर कर दिया गया। नोटबंदी के चलते पैसों की कमी की बात
बताकर परिजनों ने डाक्टरों से उन्हें अभी जिला अस्पताल में ही भर्ती रखने की प्रार्थना की। इस पर अस्पताल प्रशासन ने घसीटी को वहीं भर्ती रखा। इस दौरान पति हरदयाल ने अपने रिश्तेदारों से समस्या बताई तो एक रिश्तेदार ने उन्हें दस हजार का चेक दे दिया। इस चेक को लेकर वे उस बैंक में गए जिसमें उनका खाता था। चेक जमा करने के थोड़ी ही देर बाद
उनके खाते में पैसा आ गया। पर जब इस पैसे को उन्होंने निकालना चाहा तो बैंक कर्मियों ने उन्हें केवल तीन हजार रुपये दिए और रवाना कर दिया। वहीं हरदयाल का बेटा भी एक एटीएम में कई दिनों की जद्दोजहद के बाद दो हजार रुपये निकालकर ला सका। यह पैसा घसीटी की दवा में उरई में ही खर्च हो गया। इधर, अतिरिक्त पैसों का कोई जुगाड़ नहीं बन पा रहा
था, उधर घसीटी की हालत और बिगड़ती जा रही थी। इसी बीच शुक्रवार देर रात घसीटी ने अपनी आखिरी सांसें लीं। वो इस दुनिया से चली गईं पर अपने पीछे कुछ ज्वलंत सवाल भी
छोड़ गईं। सवाल जो यह पूछते हैं कि क्या राष्ट्रीय स्तर के फैसले लेने के पूर्व आम आदमी की समस्या को नजरंदाज किया जाना चाहिए। क्या इन फैसलों की कीमत आम आदमी को अपनी जान देकर चुकानी होगी। पति हरदयाल के आंखों में शायद यही सवाल तैर रहे थे पर वह मौन था।