रामपुरा। अयोध्या राम मंदिर की ऐसी अलख जागी कि श्रीराम जन्म भूमि आंदोलन में कूदने की एक 18 साल के युवक ने ठान ली। संकल्प लिया और निकल पड़ा अपने आराध्य को अयोध्या वापस लाने।
आंदोलन चरम पर था। परिवार के बड़ों को अनहोनी का डर था। जब नहीं मानी तो मां को उसके प्रस्थान की तैयारी मजबूरी बन गई। मन उदास और चेहरे पर अपने लाल को लेकर डर था। दुखी लेकिन ईश्वर से दुआ करते हुए मां ने अपने सबसे छोटे लाडले का तिलक कर दिया। 33 साल हो गए, मां आज भी आंखों में आंसू लेकर अपने सबसे छोटे कलेजे के टुकड़े का इंतजार कर रही है।
यह कहानी रामपुरा के जगम्मनपुर गांव के रहने वाले युवा कार सेवक नरेश चंद्र उर्फ नन्हें की है। जो उस वक्त 12वीं कक्षा का छात्र था और परीक्षा की घड़ी बस आने ही वाली थी, लेकिन उसका मन अयोध्या आंदोलन से जुड़ गया था। श्रीराम मंदिर पर हिंदूवादी संगठनों के बड़े-बड़े आंदोलनकारियों को वह हर रोज सुनता था। उनको सुनने के बाद उसने मन ही मन अयोध्या आंदोलन का संकल्प लिया। कार सेवक नरेश के बड़े भाई राधेश्याम गुजराती और सुभाष चंद्र गुजराती बताते हैं कि चार भाइयों में नरेश सबसे छोटा था और जिद्दी भी सबसे ज्यादा।
1990 का दौर था, जब उसने अयोध्या जाने की ठानी। श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन में जाने की उसकी जिद कम नहीं हुई तो पूरे परिवार को उसकी माननी पड़ी। अयोध्या चलो नारे के साथ नन्हें जगम्मनपुरा की शाम छह बजे की आखिरी बस से उरई के लिए रवाना हो गया। बताते हैं कि रास्ते में श्रीराम के नारे के साथ अयोध्या कूच कर रहे लाखों लोगों की भीड़ ने उसके प्रण को और अटल कर दिया। अयोध्या आंदोलन में हुई घटना के बाद नरेश नहीं लौटा।
बड़े भाई गिरधारी लाल जो कि अब नहीं हैं, समेत चारों भाई चिंतित हो गए। बताते हैं कि पूरा परिवार रेडियो, टेलीविजन और समाचारपत्रों को बारीकी से देखता-पढ़ता था। उस समय उसी वर्ष अक्तूबर व नवंबर को कार सेवकों पर बर्बर गोलीबारी हुई। यह जानकारी मिलती, लेकिन नन्हें का कहीं कोई जिक्र नहीं आता। नन्हें से बड़े और भाइयों में तीसरे नंबर के सुभाष आरएसएस और विहिप के पदाधिकारियों को जानते थे। इसलिए वह खुद छोटे भाई की खोज में अयोध्या रवाना हो गए। दो माह काफी प्रयास के बाद भी नन्हें नहीं मिला।
सुभाष को जगम्मनपुर में भाई की याद सताने लगी। बताते हैं कि फिर वह आगरा चले गए और नाथ संप्रदाय से संबद्ध और गोरखनाथ पीठ की शाखा के एक मंदिर में सेवारत हो गए। उस समय उन्होंने सांसद, व्यापार मंडल के पदाधिकारियों, बड़े नेताओं से भी संपर्क किया। मदद तो मिली, लेकिन नरेश नहीं मिला। 1992 में पुनः कार सेवा हुई और बुलावा आया तो छोटे भाई के संकल्प को याद कर परिवार को अनसुना कर सुभाष भी अयोध्या चल दिए। बताते हैं कि 22 जनवरी अयोध्या श्रीराम मंदिर में प्राण-प्रतिष्ठा कार्यक्रम मेरे नन्हें के लिए एक बड़ी श्रद्धांजलि अर्पित दिवस होगा।