बुंदेलखंड का पारंपरिक नृत्य ‘दिवारी’ संरक्षण के अभाव में विलुप्त होने की
कगार पर है। ग्रामीण इलाकों में कुछ बुजुर्ग इस लोक कला को आगे बढ़ाने की
कोशिश में जुटे हैं। साथ ही कहते हैं कि इस लोक कला को सरकारी मदद की दरकार
है।
बुंदेलखंड अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के लिए देश-विदेश
में ख्याति प्राप्त करता रहा है। यहां की परंपराएं, तीज
त्योहार और नृत्य
संस्कृति अपने आप में अनूठी है। ‘दिवारी नृत्य’ बुंदेलखंड की ऐसी ही एक
सांस्कृतिक विरासत है, जो इस क्षेत्र की लोक परंपरा को एक नया आयाम देती
है। अहीर जाति के लोगों से पारंपरिक रूप से जुड़ा यह नृत्य समूचे बुंदेलखंड
में प्रचलित है। ‘दिवारी नृत्य’ करने वाले नर्तक फुंदनादार रंग बिरंगे
पोशाक पहनते हैं। मुख्य नर्तक मोरपंख की मूठ हाथ में
लिए रहता है जबकि बाकी
पीठ की ओर बंधे रहते हैं। उनके हाथों में डंडे होते हैं और कमर में घुंघरू
बंधे होते हैं। ‘दिवारी नृत्य’ की टेर बड़ी ही आकर्षक होती है और इसके गीत
दो पंक्तियों के होते हैं। इसके प्रमुख वाद्य यंत्र ढोलक तथा नगड़िया
होते हैं और गीतों के गाये जाने के बाद ही यह बजाये जाते हैं। दो दशक पहले
नजर दौड़ाई जाए तो ‘दिवारी नृत्य’ के
आयोजन में भारी भीड़ उमड़ती थी।
दूर-दूर से लोग इस नृत्य का लुत्फ उठाने आते थे। पर अब धीरे-धीरे यह लोक
कला आधुनिकता की चकाचौंध में लुप्त-सी होती जा रही है। ग्रामीण इलाकों में
भले ही यह दिख जाए, शहरी इलाकों में तो लोग इसे भूलते जा रहे हैं।
दिवारी नृत्य के समय गाए जाने वाले गीत
वृंदावन
बसवौ तजौ, अरे हौन लगी अनरीत, तनक दही के कारनै फिर बैंयां गहत अहीर...’,
सदा भवानी दाहिनै सन्मुख रहें गनेश, पांच देव रक्षा करें ब्रह्म विष्णु
महेश...’ तथा खेल लै लरिका खेल लै, आज के खेले कब पाये है तोरौ कातिक भागौ
जाये...’
नृत्य के प्रशिक्षण की है जरूरत
लोक
कलाओं व ललित कलाओं में अभिरुचि रखने वाले रंगकर्मी सूर्यदीप सोनी का मानना
है कि इस कला के जानकारों को इस कला को आगे आने वाली पीढ़ी को भी सौंपना
चाहिए ताकि कला की विरासत बनी रहे। उन्होंने कहा कि इस नृत्य के प्रसार के
लिए समुचित प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए और बुजुर्ग कलाकारों को इसमें अपनी
भूमिका निभानी चाहिए।
संस्कृति विभाग ने किया प्रयास
जानकारी
मिली है कि इस पारंपरिक नृत्य को समुचित संरक्षण दिए जाने की आवश्यकता को
देखते हुए उत्तर प्रदेश का संस्कृति विभाग प्रयास कर रहा है। आंचलिक लोक
कलाओं व परंपराओं को अपनी पुस्तक में महत्वपूर्ण स्थान दिया है। लेकिन केवल
सरकारी प्रयास इस लोक विधा को संजोए रखने में नाकाफी है। इसे आम जन भी
समुचित पोषण दे, तभी कुछ बात आगे बढ़ेगी।