फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

दो वक्त की रोटी के लिए छोड़ रहे देहरी

Mon, 11 Jan 2016 11:11 PM IST
ब्यूरो/ अमर उजाला, उरई
विज्ञापन
विज्ञापन
बांध कमरिया ठाट से भइया, फड़ुवा धरलेव कंधे पर, सोना-दाना खोद के मिल्हे, माटी रखलेव माथे।’ बुंदेलखंड की यह कहावत अब बेमानी-सी होती जा रही है। खेतीबाड़ी को प्राथमिकता पर रखने वाला जालौन जिले का किसान हर साल दैवी
विज्ञापन


आपदा का प्रकोप व सुविधाओं का टोटा होने से अब खेती से मुंह मोड़कर मजदूरी करने को मजबूर है। इसके चलते दो वक्त की रोटी का बंदोबस्त करने के लिए वह जिले से पलायन तक करने लगा है। पूछने पर टका-सा जवाब देता है कि ‘बच्चे भूख से न बिलबिलाएं, इसलिए वह हर तरह की मेहनत मजदूरी करने को तैयार हैं।’

बुंदेलखंड के जालौन जिले के बीहड़ क्षेत्र ऐरी, रमपुरा, मकरेछा, सिमिरिया, बंधौली व गुढ़ा गांव के किसानों के खेत सिंचाई के अभाव में सूख रहे हैं। इससे किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आई हैं कि पैदावार न होने पर वे परिवार का पेट कैसे भरेंगे। ऐसे में यहां के छोटे किसानों को अपने परिवार को पालने के लिए खेतीबाड़ी छोड़कर दूसरे कामों की ओर रुख
विज्ञापन


करना पड़ रहा है। जानकारी करने पर पता चला कि इस समय तमाम किसानों को बोरी उठार्ना, इंट भट्ठों पथाई और दुकानों व खेतों में मजदूरी करने के लिए बाध्य होना पड़ रहा है। कई गांवों के किसान तो काम की तलाश में दूसरे गांवों व शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। आंकड़ों पर निगाह दौड़ाएं तो जालौन से लगभग 13 हजार, महोबा से लगभग 25 हजार,

हमीरपुर से 18 हजार, बांदा से 20 व चित्रकूट से 10 किसान व मजदूर परिवार के भरण पोषण के लिए काम की तलाश में पलायन कर चुके हैं। वजह साफ है कि खेतों में जुताई से लेकर पलेवा और बुआई से लेकर जिंसवारा तथा कटाई व मड़ाई तक किसानों का साथ निभाने वाले खेतिहर मजदूरों के सामने दो वक्त की रोटी का संकट खड़ा हो गया है।

दैवी आपदा से टूटता जा रहा किसान
तकरीबन हर साल कोई न कोई दैवी आपदा आने से फसलों के बर्बाद होने से किसान पूरी तरह टूटता जा रहा है। ऐसे में संसाधनों का अभाव यानी बिजली, पानी, खाद व बीज की समस्या से धैर्य जवाब देने लगा है। किसान महिपाल सिंह राजपूत, देवेंद्र सिंह, उम्मेद अली, राज कुमार आदि बताते हैं कि हाल के दिनों में बेमौसम बारिश व ओलावृष्टि तथा आंधी ने

इस कदर कहर बरपाया है कि अभी तक उबर नहीं सकें हैं। यही नहीं आने वाले दिनों में भी कुछ अच्छा होने के आसार नहीं दिख रहे हैं। इस समय पानी के अभाव में किसानों की कई एकड़ भूमि बंजर सी पड़ी है। जिले में सूखे की स्थिति से किसानों के चेहरों पर हवाइयां उड़ रहीं है।

गेहूं की बुआई का भी समय बीता
किसान रवी के समय में कई प्रकार की फसलों को तैयार करने का जज्बा रखते हैं। शर्त यह है कि मौसम और पानी का साथ मिल जाए। यह बात क्षेत्र के उन किसानों की है जो रवी के समय हरी मटर की फसल को तैयार करते हैं। इस बार मौसम व बारिश ने उनका साथ नहीं दिया है। सूखे के हालात के चलते हरी मटर की पैदावार भी नहीं हो सकी। अब तो गेहूं की बुआई का समय भी हाथ से निकल गया है। इससे किसानों में मायूसी है।

घर छोड़ निकले काम की तलाश में
बीहड़ क्षेत्र के किसान वीरेंद्र, विक्रम, रामहेत, मलखान, मइयादीन, किसोरी, रामपाल, भगवानदास, जमना, मंगी, राजाराम, राकेश, किशन आदि फसल नष्ट होने से बच्चों व महिलाओं के साथ गांवों से पलायन करने लगे हैं। गृहस्थी व मवेशियों को साथ लेकर काम की तलाश में निकल पड़े हैं।
विज्ञापन

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें