दुख में तन, मन, धन से जो साथ निभाएं, वही सच्चा मित्र होता है। मित्रता में स्वार्थ नहीं होना चाहिए, जहां भी स्वार्थ की भावना होगी, वहां सही मायने में मित्रता हो ही नहीं सकती। यह बात माधौगढ़ के गांव मिर्जापुरा में सुरेश चंद्र द्विवेदी के आवास पर हो रही श्रीमद्भागवत कथा केे अंतिम दिन वृंदावन से आए कथावाचक नंदकिशोर शास्त्री ने कही।
उन्होंने सुदामा चरित्र की कथा का विस्तार से वर्णन करते हुए कहा कि मित्र ही मित्र के काम आता है। जो दुखों में मित्रता निभाएं, वहीं सच्चा मित्र होता है। भगवान श्रीकृष्ण केे बचपन केे मित्र सुदामा ब्राह्मण सुबह से शाम तक भजन पूजा कर भगवान की भक्ति में लीन रहते थे।
उनके घर में गरीबी का आलम यह था कि कई कई दिन तक भोजन नहीं मिल पाता था। उनकी पत्नी सुशीला ने सुदामा से अपने बचपन के मित्र श्रीकृष्ण के पास जाने को कहा तो सुदामा अपने मित्र केे यहां पहुंचे, जहां उनकी दीन दशा देखकर भगवान के आंखों में आंसू आ गए।
भगवान ने गले से लगाकर उन्हें पूरा सम्मान किया और धन, वैभव से पूर्ण कर दिया, उनकी मित्रता को लोग आज भी याद करते हैं। कथा केे अंत में परीक्षित सुरेश चंद्र द्विवेदी व शकुंतला देवी ने श्रीमद्भागवत महापुराण की आरती उतारी। इस मौके पर अनिल मिश्रा, राहुल दुबे, ममता, अनुराधा, शिल्पी, धर्मेंद्र, अमिता, अखिलेश कुमारी आदि मौजूद रहे।