उरई। जेठ की दोपहर में बीते दो दशक पहले का बचपन गर्मियों में नाना-नानी के यहां नंगे पैर दौड़ा करता था। घने आम के पेडों की छांव के नीचे बचपन कलरव किया करता था।विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति का साथ छूटा तो धूप झुलसाने लगी।
घने जंगलो के साथ ही बुंदेलखंड की जीवन कही जाने वाली नदियां भी सिकुड़ने लगी हैं। हर साल बढ़ता तापमान अब पूरी मानवता के लिए खतरा बनने लगा है। ऐसे में जरूरी है कि अब हम अपनी आने वाली पीढ़ी की रक्षा के लिए प्रकृति के साथ कदमताल मिला कर चलने की आदत डाल लें।
एक रिपोर्ट-
गर्मियों की छुट्टियों के दौरान एक वक्त था जब अधिकतर गांवो में बिजली भी नहीं हुआ करती थी। भरी दोपहर में लोग छायादार पेडों की छांव में वक्त बिताया करते थे। घरों की छत पर पूरा परिवार लेट कर आकाशगंगा में सप्तऋषि तारामंडल को देखकर बच्चों को कहानियां सुनाया करता था।
वहीं मौजूदा दौर का बचपन एसी के कमरों में कैद होकर रह गया है। बदलते मौसम ने तपिश इतनी बढ़ा दी है कि जून के महीने में दोपहर को बाहर निकलने में जान का जोखिम बना रहता है। घने पेड़ वातावरण को शुद्ध रखने के साथ ही बढ़ते तापमान को भी रोकने में सहायक होते है। घने छायादार पेड वाले स्थानों पर तापमान 2 से 4 डिग्री तक कम रहता है।वृक्ष शुद्ध हवा के साथ ही मानवता के लिए वरदान है। ऐसे में जरूरी है कि हम सब खुद को प्रकृति के साथ जोड़कर चलने की आदत डाल लें।
नदियों के आस्तित्व पर संकट -
बुंदेलखंड में नदियां यहां की जैव विविधता के लिए वरदान बनी रहीं हैं। चंबल ,यमुना ,सिंधु ,पहूंज ,क्वारी जैसी नदियों का संगम पचनद कहलाता है। वहीं यमुना की सहायक नदी बेतवा भी कृषि के साथ ही लोगों की प्यास बुझाने में सहायक रहीं है। पिछले कुछ समय से इन नदियों के आस्तित्व को बचाने का संकट खडा हो गया है।
अंधाधुंध खनिज संपदा का दोहन नदियों के अविरल प्रवाह को प्रभावित कर रहा है। वहीं खनन की वजह से बेतवा ,यमुना ,केन जैसी नदियों के आसपास के इलाकों में जलस्तर घटता चला जा रहा है। हैरत की बात तो यह है कि नदियों के किनारे बसी एक बड़ी आबादी पानी के लिए त्राहि त्राहि कर रही है। केंद्र सरकार की योजना के तहत छोटी नदियों के संरक्षण के लिए प्रयास किए जा रहे है, ताकि सदियों से लोगों के लिए जीवन का आधार बनी यह नदियां विलुप्त होने से बचाई जा सकें।
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आओ बनाए बेहतर कल , आने वाली पीढ़ी को मिल सके शुद्व वायु और पेयजल
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पर्यावरण का संरक्षण करना अब मानवता की रक्षा करने के लिए जरूरी बन गया है। बिगड़ता मानसून, घटते वन क्षेत्र, गिरता भू गर्भ जल अब डराने लगा है। आने वाली पीढ़ी को एक बेहतर कल देने के लिए हमारी सामाजिक जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर यह संकल्प भी जरूरी है कि करोड़ों की तादात में लगाए जाने वाले पौधे सिर्फ कागजों पर ही न दिखें। बल्कि उन्हे संरक्षित किया जा सके।
वन विभाग की ओर से हर साल जनपद में लाखों पौधे लगाए जाते हैं, लेकिन रखरखाव के अभाव में यह पौधे वृक्ष बनने से पहले ही सूख जाते हैं। इस बार हम सभी मानवता की रक्षा के लिए एक पेड़ जरूर लगाएं और उसकों संरक्षित करे ताकि आने वाली पीढ़ियां सुरक्षित रह सकें और प्रकृति के अंधाधुंध दोहन हो लेकर हमसे सवाल न कर पाएं।