नगर व ग्रामीण क्षेत्र में देवोत्थान एकादशी का त्योहार बड़े ही हर्षोल्लास
से मनाया गया। इस दिन गन्ने की पूजा तथा ठाकुरजी को आग के समीप बैठा कर
तपाए जाने की भी परंपरा निभाई गई। मान्यता के अनुसार इस दिन से मांगलिक
कार्यों का आयोजन शुरू हो जाता है। इस दिन जहां घरों में स्त्रियों ने
तुलसी-शालिग्राम का ब्याह रचाया वहीं, छठी माता के
मंदिर पर लगे मेले में
नगर व ग्रामीण क्षेत्र की हजारों महिलाओं ने पूजा-अर्चना की। देव-उत्थान
एकादशी पर लोगों ने गन्ना की पूजा की। गन्ने को घर में आंगन के बीचोंबीच
गोल घेरे में लगाकर उसके नीचे ठाकुरजी को बैठाकर उनकी पूजा-अर्चना की। पूजा
के दौरान ठाकुरजी को आग से तपाए जाने का भी प्रावधान है। माना जाता है कि
आज के दिन से
ही सर्द ऋतु की हवाओं का चलना आरंभ हो जाता है। इस माह की
एकादशी को ‘प्रबोधनी एकादशी’ के नाम से भी जाना जाता है। कई शास्त्रों के
अनुसार ठाकुरजी अषाढ़, सावन, भादौं व क्वांर मास में विश्राम के लिए जाते
हैं। एकादशी को वे जाग जाते हैं और इसके साथ ही घरों में मांगलिक कार्य
शुरू हो जाते हैं। इस दिन महिलाएं तुलसी-शालिग्राम के विवाह का आयोजन करती
हैं।
एकादशी के अवसर पर नगर के छठी माता मंदिर पर मेले का आयोजन किया
गया। इस दौरान हजारों महिलाओं ने देवीजी के मंदिर में जाकर पूजा-अर्चना कर
प्रसाद चढ़ाया। मुहल्ला चुर्खीबाल में अजय कुमार चतुर्वेदी के यहां से
शालिगराम की शानदार बारात निकाली गई। ये रामस्वरूप कुशवाहा के यहां तुलसी
जी को ब्याहने पहुंची। सभी पारंपरिक रस्मों के साथ शालिगराम व तुलसी का
ब्याह हुआ।
उठो देव, उठो देव, गुड़ माड़े खाओ...
देवोत्थान एकादशी पर्व परंपरागत रूप से मनाया गया। त्योहार के मद्देनजर गन्ना खूब महंगा बिका।
चार
महीने तक शयन के बाद कार्तिक शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु जाग गए हैं। घर
के सभी सदस्यों ने विधि विधान से भगवान की पूजा की और बाद में धान डाल कर
सभी ने प्रदक्षिणा की। पूजा करते समय बुंदेली परंपरानुसार भगवान से
प्रार्थना की जाती है, ‘उठो देव, उठो देव, गुड़ माड़े खाओ, कुंवारिन के
व्याऔ कराओ, व्यावन के चलाये कराओ’। घरों के दरवाजों पर दीये भी जलाए गए और
बच्चों ने पटाखे फोड़े। शाम के समय बच्चों ने ओदबोद के प्रदर्शन कर पर्व
का आनंद लिया। पर्व पर पूजा जाने वाला गन्ना भी खूब बिका। गांव देहात के
तमाम गन्ना किसान ट्रैक्टरों और गाड़ियों में भर कर गन्ने शहर में बेचने के
लिये लाए।
तुलसी जी और शालिग्राम बंधे परिणय बंधन में
देवोत्थानी एकादशी पर शुभ कार्य शुरू होते ही जगह-जगह तुलसी और शालिग्राम का विवाह कराया गया।
देवोत्थानी
एकादशी के दिन तमाम लोग तुलसी-शालिग्राम विवाह का भी आयोजन करते हैं।
रविवार को यहां तिलक नगर इलाके में भगतसिंह निरंजन मास्टर के यहां भी
तुलसी-शालिग्राम परिणयोत्सव हुआ। बैंडबाजों के साथ ग्राम अकनीबा से
कामता
प्रसाद निरंजन के यहां से शालिग्रामजी की बारात आई और बैंडबाजों की धुनों
के बीच द्वारचार की रस्में शैलेन्द्र निरंजन शीलू नेकराई। चीकटें भी उतारी
गईं तथा अन्य रस्में आदि विधि विधान के साथ ठीक उसी प्रकार संपन्न हुईं
जिस तरह यहां आम लोकजीवन में होती हैं। विद्वान ब्राह्मण रमाकांत तिवारी ने
विवाह संपन्न कराया। कन्यादान किशोरी व
भगतसिंह मास्टर ने किया, मांग भरने
की रस्म निशा पटेल ने पूरी की, बिछिया दबाने का कार्य रचना निरंजन-शीलू ने
किया। इस दौरान राममोहन मुद्गिल, रामकिशोर निरंजन धंतौली, जागेश्वरी
निरंजन, ऐंन्द्रकुमार निरंजन विरगुवां, बबलू निरंजन वरोदा, जगदीश अग्रवाल,
रामकुमार भदारी, सियाराम, रामनरेश, विजयसिंह, उमेश परैथा आदि मौजूद रहे।