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54 सालों में सदर सीट से छह विधायक कांग्रेस के बने

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उरई। कई साल पहले तक जिले में भी कांग्रेस की तूती रही है। बीते 35 सालों में सदर सीट से कांग्रेस के छह विधायक चुने जा चुके हैं। वहीं कालपी से तीन बार की विधायकी कांग्रेस के हिस्से में रही है।
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बात वर्ष 1967 की है जब उरई की सदर सीट 337 नंबर से जानी जाती थी। उस समय भारतीय क्रांति दल की हवा के बीच भी जिला जालौन की उरई सदर सीट चतुर्भुज शर्मा ने 34,169 वोट हासिल कर जीत दर्ज की थी। इन्होंने अपने भारतीय जनसंघ के प्रतिद्वंद्वी वी सिंह 16,499 मतों से हराकर कांग्रेस का झंडा बुलंद किया था। इसके बाद 328 दिन बाद सरकार गिरी और 25 फरवरी 1968 में राष्ट्रपति शासन लग गया। इसके बाद वर्ष 1969 में दोबारा चुनाव हुए और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में सबसे अधिक सीटें जीतकर सरकार बनाई। मुख्यमंत्री चंद्रभान गुप्ता बनाए गए। इस बार भी कांग्रेस के चतुर्भुज शर्मा ने 26,766 वोट लेकर चुनाव तो जीत लिया। पर प्रतिद्वंद्वी भारतीय क्रांति दल के सुरेंद्र पाल सिंह ने कड़ी टक्कर दी थी। दोनों के बीच वोटों का अंतर सिर्फ 787 वोटों का रहा था। वर्ष 1974 में उरई सदर सीट अब 337 की जगह 333 नंबर से जानी जाने लगी थी। इस बार सीट का नाम बदलने के साथ ही कांग्रेस ने इस सीट से चेहरा भी बदल दिया था। हालांकि इसके बावजूद आनंद स्वरूप ने 37,074 वोट लेकर भारतीय क्रांति दल के दावेदार सुरेंद्र पाल सिंह को 16,394 मतों से हराकर बड़ी जीत हासिल की थी। इस बार के चुनाव से कांग्रेस ने मान लिया था कि उसकी जिले में जड़ें मजबूत है। अब यहां जनाधार बढ़ता ही जाएगा। पर वर्ष 1977 में यह आत्मविश्वास कमजोर पड़ गया। इस बार कांग्रेस ने फिर चेहरा बदला और इंद्रराज एमएम सिंह को सदर सीट से उतारा। इस बार जनता पार्टी के श्याम सुंदर 37,032 वोट पाकर कांग्रेस प्रत्याशी को 37 वोटों से हरा दिया। लगभग सात साल के बाद यह सीट कांग्रेस के पाले से खिसक गई।
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23 हजार वोटों से जीते थे कांग्रेस के अरविंद तिवारी
तीन साल की मेहनत के बाद फिर एक बार 1980 और 1985 में सदर सीट पर कांग्रेस का कब्जा रहा। 1980 में सुरेश दत्त पालीवाल ने जनता दल (जेएनपी) के अनुसूचित प्रत्याशी इंद्रजीत सिंह को 3619 वोटों से हरा दिया। वहीं 1985 में कांग्रेस के अरविंद तिवारी जनता दल छोड़कर लोकदल में पहुंचे इंद्रजीत सिंह को 23,341 वोटों से हराकर विधायक बने थे।
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17 साल के वियोग के बाद 2007 मिला मौका
1985 के चुनाव के बाद 1989 से लेकर 1996 तक करीब चार बार विधानसभा के चुनाव हुए। पर सदर सीट पर कांग्रेस ंदूसरे स्थान पर भी नहीं रही। इन सालों में सीधा मुकाबला बसपा और भाजपा के बीच हो गया। जिले की उरई सीट से अपनी जमीन खोती जा रही कांग्रेस को 2002 में संजीवनी मिली। इस बार सीट का नाम 333 से बदलकर 317 हो गया। इसके साथ ही इस बार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी बने विनोद चतुर्वेदी ने बसपा को रेस से बाहर कर भाजपा के प्रत्याशी बाबूराम एमकॉम को कड़ी टक्कर दी। हालांकि बाबराम एमकॉम ने कांग्रेस प्रत्याशी को 1912 वोटों से हरा दिया। इस चुनाव से कांग्रेस की उम्मीद फिर जागी तो विनोद चतुर्वेदी पहले ऐसे प्रत्याशी बने। वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने दोबारा विनोद चतुर्वेदी को उतारा। इस चुनाव में विनोद चतुर्वेदी को पिछली बार से वोट जरूर कम मिले, लेकिन इस बार उन्होंने अपने प्रतिद्वंद्वी बसपा के सुरेश तिवारी को 3093 वोटों से हराकर जीत दर्ज की।
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सीट सुरक्षित होने के बाद से फिर कांग्रेस रेस से बाहर
वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में परसीमन होने के बाद कोंच विधानसभा को खत्म कर जिले में उरई सदर, कालपी और माधौगढ़ सीट कर दी गईं। इस बदलाव के तहत कोंच सुरक्षित सीट खत्म होने के बाद उरई सदर को सुरक्षित सीट घोषित कर दिया गया है। इसके बाद फिर एक बार कांग्रेस रेस से बाहर हो गई। 2012 और 2017 के चुनाव में भाजपा, सपा और बसपा लड़ाई में दिखीं। इस बार युवा जिलाध्यक्ष बनाकर और महिला प्रत्याशी उर्मिला सोनकर खाबरी को टिकट देकर कांग्रेस फिर सदर सीट जीतने की कवायद में जुटी है।
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शिव संपति शर्मा दो बार जीते दो बार दूसरे स्थान पर रहे
कालपी विधानसभा सीट से भी कांग्रेस का पुराना नाता रहा है। यहां वर्ष 1962 के चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी पंडित शिव संपति शर्मा ने 17,450 वोट हासिल कर प्राजो सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी मन्नी लाल अग्रवाल को हराकर जीत दर्ज की थी। इसके बाद 1967 में भी कांग्रेस ने शिव संपति शर्मा पर ही भरोसा जताया। पर इस बार भारतीय जनसंघ के प्रत्याशी सीएस सिंह ने मात्र 847 वोट से उन्हें हरा दिया। वर्ष 1968 में राष्ट्रपति शासन लगने के बाद वर्ष 1969 में दोबारा हुए चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी बनकर उतरे शिव संपति ने पार्टी को निराश नहीं किया और उन्होंने भारतीय जनसंघ के चौधरी शंकर सिंह को हराकर 3369 वोटों से जीत दर्ज कर ली। वर्ष 1974 के चुनाव में पार्टी ने चौथी बार शिव संपति शर्मा पर भरोसा जताते हुए उन्हें टिकट दिया। पर इस बार भारतीय जनसंघ के नए चेहरे बीर सिंह के सामने नहीं टिक सके और लगभग आठ हजार वोटों से हार गए। वर्ष 1977 और वर्ष 1980 में लगातार जनता पार्टी के शंकर सिंह इस सीट पर काबिज रहे। वर्ष 1985 में चेहरा बदलकर कांग्रेस का खेला दांव सफल हुआ। कांग्रेस प्रत्याशी बद्री सिंह लगभग साढ़े तीन हजार वोटों से जीतकर विधायक बन गए। इसके बाद लगभग 14 साल तक कांग्रेस रेस में भी नहीं रही। इसके बाद 2012 में कांग्रेस प्रत्याशी उमाकांति सिंह ने 6650 वोटों से बसपा के संजय सिंह को हराकर पार्टी की वापसी कराई। पार्टी ने इस बार भी उमाकांति पर भरोसा जताते तैयारी शुरू कर दी है।
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