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नवजात व माता पिता का सैंपल भी नहीं लिया

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उरई। श्रमिकों की सुरक्षा के लिए दावे कर रही सरकार की अधिकारी कितनी सुन रहे हैं, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बच्चे की मौत के बाद जिला अस्पताल, महिला अस्पताल और जीआरपी तक के किसी भी अधिकारी ने मुंबई से लौटे सर्वेश व उसके परिवार के अन्य लोगों के सैंपल लेने तक की जरूरत नहीं समझी। बोझ समझकर आनन फानन में परिवार के सभी लोगों को पीछे से आ रही दूसरी ट्रेन पर सवार कर पल्ला झाड़ लिया गया। बता दें कि ट्रेन, बस अथवा हाईवे पर किसी अन्य वाहन से आने वाले मजदूरों के संदिग्ध मामलों में सैंपल लिए जाते हैं। फिर भी परिवार स्टेशन से लेकर अस्पताल तक भटकता रहा लेकिन कहीं किसी ने सैंपल की कोई बात नहीं की।
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ट्रेन से उतारा, फिर ट्रेन पर चढ़ाया
सोमवार शाम ट्रेन से बच्चे को उसके माता पिता के साथ उतारा गया, बाद पीछे से आ रही दूसरी ट्रेन जो कि भदोही जा भी नहीं रही थी, उस पर यह कहकर बैठा दिया गया कि कानपुर से आगे के लिए कोई न कोई साधन मिल ही जाएगा। सवाल उठता है कि ट्रेन से भी आगे भेजना था, तो उसे रोककर उतारा क्यों गया। इस पर जीआरपी इंस्पेक्टर बृजमोहन सैनी का कहना है कि सूचना बच्चे की हालत बिगड़ने की थी, इसलिए ही ट्रेन को रोककर उसे इलाज के लिए उतारा गया था।
शव कलेजे से लगाकर बिलखती रही किरन
अपने कलेजे के टुकड़े के शव को सीने से लगाकर ट्रेन में सफर करती किरन को जिसने भी देखा, उसकी आंखे आंसुओं से डबडबा गई। बार बार वह बच्चे से रास्ते भर कहती रही उठो बउवा तुम्हें कुछ नहीं हुआ, जो भी सुनता वह अपनी आंखों के आंसू पोंछने लगता था।
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