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सूखे के बाद तिल की मंदी ने तोड़ी कमर

Wed, 24 Feb 2016 11:04 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो, उरई
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कई साल से सूखा और अति व ओलावृष्टि की मार झेल रहे बुंदेलखंड के किसानों के लिए दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना भी किसी जंग लड़ने से कम नहीं रहा है। संजीवनी का काम करने वाली तिल की खेती भी इस बार घाटे का सौदा रही है। एक तो उत्पादन कम हुआ, ऊपर से बाजार भाव भी आधा रह गया। ऐसे में किसान कसमसाकर रह गया है कि
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आखिर करे भी तो क्या। माना जा रहा है कि निर्यात में कमी आने से भी तिल के दाम पर विपरीत असर पड़ा है। किसानों ने आगे भाव बढ़ने की उम्मीद में फसल को भंडारित कर लिया है।बता दें कि पिछले वर्ष तिल की फसल अच्छी हुई। किसान खुशी मनाता इससे पहले ही अति और ओलावृष्टि ने उसके मंसूबों पर पानी फेर दिया। इलाके की नब्बे

फीसदी फसलें खराब हो गईं। खेत तालाब बन गए और फसलें खड़ी-खड़ी सड़ र्गइं। पहले से ही बैंकों और साहूकारों के कर्जों से दबे किसानों के लिए यह स्थिति असहज हो गई। कोई रास्ता न देख कई किसानों ने जिंदगी का दामन ही छोड़ दिया। इसके बाद सरकार ने अपने खजाने का मुंह खोला भी लेकिन फसलों की पूरी क्षति की भरपाई नहीं हो सकी। डेढ़
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से नौ हजार रुपये तक बतौर सहायता राशि सरकार ने किसानों को चेक दिया। यह मदद भी एक साल के बाद अब तक सभी किसानों को नहीं मिल सकी है। हजारों किसान अब भी ऐसे हैं जिनके खातों में इमदाद की रकम नहीं पहुंची है। इसके बाद खरीफ की फसल से आस थी लेकिन कम बरसात से ये आस भी जाती रही। इस बार तिल की फसल आधी

रह गई और अन्य दलहनी फसलें पूरी तरह बर्बाद हो गईं। अन्नदाता फिर दाने-दाने को मोहताज हो गया। बीमा कंपनियों ने प्रीमियम काटा जरूर लेकिन जब क्लेम देने की बात आई तो हाथ खड़े कर दिए। जो तिल पैदा भी हुआ उसके दाम इतने कम मिल रहे हैं कि लागत भी निकलती नहीं दिख रही।

जालौन प्रतिनिधि के अनुसार तिल के दामों में गिरावट का एक बड़ा कारण निर्यात में कमी भी है। वर्ष 2014-15 में तिल के दाम 9 हजार से लेकर 13 हजार रुपये प्रति क्विंटल तक रहे। इस ये 4 से 5 हजार रुपये क्विंटल के बीच चल रहे हैं। प्रगतिशील किसान रमेशचंद्र मिश्रा, गौरव गुर्जर, राजवीर सिंह गुर्जर आदि बताते हैं कि तिल की फसल इस बार

थोड़ी खराब हुई लेकिन बाजार से काफी उम्मीदें थीं। बाजार के दगा देने से उनका घाटा और बढ़ गया है। ऐसे में ज्यादातर किसानों ने तिल का स्टाक कर लिया है। उन्हें उम्मीद है कि आने वाले महीनों में अच्छी कीमत मिल सकती है। विजय शर्मा छिरिया, विनय माहेश्वरी, लोकेंद्र सिंह निरंजन पहाड़पुरा आदि किसानों का कहना हैं कि इस बार विदेशों

में तिली की मांग कम  है। इसलिए तिल के निर्यात में भी काफ ी कमी आई है। इसलिए सही मूल्य नहीं मिल पा रहा है। उधर, मंडी सूत्रों के अनुसार वर्ष 2014-15 में मंडी में 12,731 क्विंटल तिल बेचा गया जबकि इस वर्ष जनवरी तक ही पिछले वर्ष की अपेक्षा पांच गुने से अधिक लगभग 62 हजार क्विंटल तिल बेचा गया। जानकार बताते हैं कि

क्षेत्रीय किसान अपने-अपने घरों में तिल को रखकर मूल्य वृद्धि का इंतजार कर रहे हैं। जैसे ही तिली के दामों में वृद्धि होगी, किसान अपनी फसल बजार में जरूर ले आएंगे। उन्नतशील किसान राधेश उदैनिया खनुआं, सतेंद्र खत्री आदि ने

बताया कि तिल की फ सल को दो साल घर में रख सकते हैं। इससे अधिक समय तक तिल को रखने से वह खराब होने लगता है। यदि इतने समय में भी तिल के दाम न बढ़े तो किसानों के हालात काफ ी खराब हो जाएंगे।
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