मुहम्मदाबाद। बेहतर मुनाफे की उम्मीद लेकर झांसी जनपद के मऊरानीपुर क्षेत्र से आए किसानों की मेहनत एक बार फिर मौसम की मार के आगे बेकार साबित हो गई। शुक्रवार को आई आंधी व बारिश ने कुसमिलिया गांव में करीब 50 बीघा भूमि पर की गई खरबूजे की खेती इस बार पूरी तरह बर्बादी की कगार पर पहुंच गई है। इससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है।
जानकारी के अनुसार मऊरानीपुर से आए किसान हर वर्ष अक्तूबर माह में अपने परिवारों के साथ कुसमिलिया गांव में डेरा डालकर खेती करते हैं। स्थानीय किसान उन्हें खेत और पानी निशुल्क उपलब्ध कराते हैं, जबकि बीज, खाद और दवाइयों का खर्च दोनों पक्ष मिलकर वहन करते हैं। फसल तैयार होने के बाद होने वाले लाभ को आपसी सहमति से आधा-आधा बांटा जाता है। यह व्यवस्था वर्षों से चल रही है, लेकिन लगातार तीसरे साल खराब मौसम ने इस साझेदारी को नुकसान में बदल दिया है।
इस बार शुरुआती दौर में फसल अच्छी बताई जा रही थी। खरबूजे की बेलें खेतों में फैल भी रही थीं और किसानों को अच्छे उत्पादन की उम्मीद थी, लेकिन बाद में हालात तेजी से बिगड़ गए। खेतों में अधिक मात्रा में हरा चारा उग आने से खरबूजे की बेलों को सही जगह नहीं मिल पाई, जिससे उनका विकास प्रभावित हुआ।
इसके बाद हुई बारिश और तेज हवाओं ने स्थिति और खराब कर दी। कई जगहों पर खरबूजे की बेलें टूट गईं, जबकि फल मिट्टी में चिपककर सड़ने लगे। कुछ फल तेज गर्मी और नमी के कारण फट भी गए। किसानों का कहना है कि अब हालत यह है कि पूरी फसल लगभग नष्ट हो चुकी है।
मऊरानीपुर निवासी किसान सुजीत ने बताया कि वह इस बार अपनी मां सुशीला देवी, पत्नी क्रांति, बेटे नानू और नातिन मंजू के साथ कुसमिलिया में खेती करने आए थे। उन्होंने बताया कि शुरुआत में फसल बहुत अच्छी लग रही थी, लेकिन लगातार बारिश और तेज हवाओं के बाद पूरी मेहनत पर पानी फिर गया। किसानों का कहना है कि लगातार तीसरे साल खराब मौसम के कारण उन्हें भारी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ रहा है। अब वे प्रशासन से किसी प्रकार की मदद या राहत की उम्मीद लगाए बैठे हैं, ताकि भविष्य में इस तरह के नुकसान से कुछ राहत मिल सके।
लागत निकाला तक मुश्किल
फोटो - 25 किसान सुशीला।
सुशीला ने बताया कि केवल 10 बीघा खेती पर ही करीब 50 हजार रुपये तक का खर्च आता है। इसमें लगभग 12 हजार रुपये बीज, 8 हजार रुपये डीएपी खाद, 15 से 20 हजार रुपये तक दवाइयों का खर्च और बाकी जुताई-बुआई व मजदूरी शामिल होती है। इस बार पूरे क्षेत्र में करीब 50 बीघा में खरबूजे की खेती की गई थी, लेकिन पैदावार बेहद खराब होने से लागत निकालना भी मुश्किल हो गया है।
फोटो -26 किसान धर्मेंद्र।
स्थानीय किसान धर्मेंद्र ने बताया कि गांव में हर साल बाहर से आने वाले किसान खेत और पानी लेकर खेती करते हैं और मुनाफा आपस में बांटा जाता है, लेकिन इस बार स्थिति पूरी तरह उलट गई है। उन्होंने कहा कि यदि इस बार मूंग या अन्य फसल की खेती की गई होती तो शायद कुछ फायदा मिल जाता, लेकिन खरबूजे की फसल पूरी तरह नुकसान में चली गई।
किसान पांच से दस रुपये किलो खरबूजा बेचने के लिए मजबूर
बाजार में जहां सामान्य समय में खरबूजा 40 से 80 रुपये प्रति किलो तक बिकता है, वहीं इस बार किसान इसे 5 से 10 रुपये किलो तक बेचने को मजबूर हैं। कई व्यापारी खराब गुणवत्ता के कारण खरीदने से भी मना कर रहे हैं, जिससे बड़ी मात्रा में फसल खेतों में ही खराब हो रही है।
खरबूजे की फसल को नहीं मिलता है, मुआवजा
खरबूजे की फसल का बीमा नहीं होता है। इसको राजस्व विभाग की ओर से क्षतिपूर्ति मिल सकती है। किसान इसकी जानकारी अधिकारियों को दें तो राहत मिल सकती है। - एसके उत्तम, डीडी।