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Jalaun News: सिक्कों के शौक ने दिलाई पुरवार दंपती को पहचान

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फोटो-14-डॉ. हरिमोहन पुरवार व संध्या पुरवार। - फोटो : ​विकास भवन।
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उरई। तुम सिक्कों के संग्रह के बारे में कुछ नहीं जानते… मित्र की यह बात डॉ. हरीमोहन पुरवार के जीवन की दिशा बदल देगी, शायद उस समय किसी ने नहीं सोचा था। वर्ष 1980 में शुरू हुआ सिक्कों के संग्रह का यह शौक आज उन्हें देश भर में विलक्षण मुद्रा संग्राहक और विरासत संरक्षक के रूप में पहचान दिला चुका है। इस पूरे सफर में उनकी पत्नी संध्या पुरवार हर कदम पर उनके साथ रहीं और दोनों ने मिलकर अपने निजी संग्रह को सांस्कृतिक धरोहर का रूप दे दिया।
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डॉ. पुरवार बताते हैं कि वह मूल रूप से विज्ञान के छात्र रहे हैं। वर्ष 1970 में उन्होंने बरेली कॉलेज से बायोलॉजी विषय में बीएससी की पढ़ाई पूरी की थी। पढ़ाई के बाद वह व्यापार में व्यस्त हो गए। इसी दौरान जालौन निवासी उनके मित्र पूरन लाल अग्रवाल सिक्कों का संग्रह किया करते थे। एक दिन मित्र ने उनसे कहा कि उन्हें सिक्कों के संग्रह के बारे में कोई जानकारी नहीं है। यही बात उनके मन में बैठ गई और वर्ष 1980 से उन्होंने सिक्कों के संग्रह का कार्य शुरू कर दिया।

धीरे-धीरे यह शौक शोध और इतिहास संरक्षण के जुनून में बदल गया। आज उनके निजी संग्रहालय में दुर्लभ और विलक्षण मुद्राओं के अलावा एक हजार से अधिक डाक टिकट, विभिन्न आकारों के शंख, सीप, कौड़ियां, संगीत वाद्ययंत्र, जल पात्र, बॉटल ओपनर, सरौते, कैंचियां, गुड्डे-गुड़ियां तथा भगवान बुद्ध से संबंधित अनेक दुर्लभ वस्तुएं संग्रहित हैं।
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उनकी इसी अनूठी साधना ने वर्ष 2020 में उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिलाई, जब उनका नाम लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज हुआ। उन्होंने 230 विलक्षण मुद्राओं के पुराने रिकॉर्ड को तोड़ते हुए 732 दुर्लभ मुद्राओं का संग्रह कर नया कीर्तिमान स्थापित किया जो आज तक कायम है। उनकी विलक्षण मुद्रा प्रदर्शनी में कांगो, पलाऊ, सोमालिया, श्रीलंका, चीन, कनाडा और भारत सहित कई देशों की अनोखी मुद्राएं आकर्षण का केंद्र बनी हुई हैं। भवनों, पशु-पक्षियों, पिरामिड, ज्यामितीय आकृतियों और धार्मिक प्रतीकों के आकार वाले सिक्के दर्शकों को इतिहास और कला की अनूठी दुनिया से परिचित करा रहे हैं। यह दंपती आज इस बात की मिसाल बन चुका है कि यदि जुनून, शोध और समर्पण साथ हो, तो निजी रुचि भी समाज की सांस्कृतिक धरोहर बन सकती है। (संवाद)





इंसेट

मित्र की एक बात ने बदल दी जिंदगी

डॉ. हरीमोहन बताते हैं कि वर्ष 1980 में उनके मित्र पूरन लाल अग्रवाल सिक्कों का संग्रह किया करते थे। एक दिन उन्होंने मजाक में कहा कि “तुम सिक्कों के संग्रह के बारे में कुछ नहीं जानते।” यही बात उनके मन को छू गई और उसी दिन से उन्होंने सिक्कों के संग्रह का कार्य शुरू कर दिया। आज यही शौक उन्हें देश भर में पहचान दिला चुका है।



18 पुस्तकें और सैकड़ों सम्मान

वर्ष 1996 में बुंदेलखंड विश्वविद्यालय ने उन्हें जनपद जालौन के मध्यकालीन भवनों का ऐतिहासिक मूल्यांकन विषय पर डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी की उपाधि प्रदान की। इसके बाद से वह लगातार बुंदेलखंड के इतिहास, संस्कृति और पुरातात्विक विरासत पर कार्य कर रहे हैं। बुंदेलखंड के इतिहास और संस्कृति पर उनकी 18 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। विरासत संरक्षण और संग्रह के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्यों के लिए उन्हें सैकड़ों संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।
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