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दो लोकसभा चुनावों में मुद्दा रहा कालपी का अधूरा हाईवे

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कालपी (जालौन)। लोकसभा चुनाव का बिगुल भले ही बज चुका हो और दो दलों ने अपने लड़ाके भी मैदान में उतार दिए हों, लेकिन अभी तक चुनावी मुद्दे मानो भाजपा के प्रत्याशी की ही राह तक रहे हों। फिलहाल नेता अपने चेहरे और बिरादरी के नाम पर वोट मांगते घूम रहे। यह बात और है कि 2009 और 2014 के दोनों लोकसभा और 2107 के विधानसभा चुनावों में सबसे बड़ा मुद्दा बना कालपी का अधूरा हाईवे इस बार चुनावी चर्चा से भी दूर नजर आ रहा है। वजह है कि इस वर्ष हाईवे निर्माण का कार्य अंतिम समय में जिला प्रशासन के विशेष प्रयास से तेजी से शुरू हो गया है। मतदाताओं का भी कहना है कि 2019 में कम से कम कालपी का हाईवे तो मुद्दों की सूची में नहीं रहेगा।
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बता दें कि 2006 से ही अधूरे कालपी हाईवे पर जाम लगने की समस्या शुरू हो गई थी। स्थिति यह थी कि भूमि अधिग्रहण न हो पाने की वजह से यहां कई-कई घंटों राहगीरों को जाम के झाम से जूझना पड़ता था। वर्ष 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में यह मुद्दा सबसे गर्म रहा, लगभग सभी जनसभाओं में यह मुद्दा उठाया गया। उस समय के सपा प्रत्याशी घनश्याम अनुरागी तो कई बार कालपी आकर हाईवे संघर्ष समिति के विरोध प्रदर्शन में शामिल भी हुए और इस मुद्दे पर संघर्ष का उन्हें लाभ भी मिला है और वह 2009 में सपा के टिकट पर सांसद चुने गए पर इसके बाद इस मुद्दे को वह भूल गए और जाम की समस्या जस की तस बनी रही।

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर कालपी का जाम प्रमुख मुद्दा बन कर सामने आया। इस बार भाजपा प्रत्याशी भानु प्रताप वर्मा ने इस मुद्दे को हथियार बनाकर विपक्षियों को कटघरे में खड़ा किया जनता ने इस मुद्दे पर उनके तेवरों को देखकर उनपर भरोसा किया और वह बड़ी जीत के साथ 2014 मे यहां से संसद सदस्य चुने गए। केंद्र में भाजपा सरकार भी बन गई तो इस मुद्दे को सुलझाने की पहल शुरू हुई, लेकिन वह भी कुछ खास रंग न ला सकी। इसी मुद्दे को लेकर 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में इस संसदीय सीट की पांचों विधानसभाओं में भाजपा के विधायक चुने गए।
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यूपी में भी सरकार बनने के बाद कालपी के विधायक नरेंद्र पाल सिंह जादौन, उरई विधायक गौरी शंकर वर्मा, माधौगढ़ विधायक मूलचंद्र निरंजन, गरौठा विधायक जवाहर राजपूत, भोगनीपुर विधायक विनोद कटियार आदि विधायकों ने इस मामले को लेकर मुख्य मंत्री से मुलाकात कर वार्ता भी की।

मुख्यमंत्री के निर्देश पर जिला प्रशासन ने इस समस्या को प्रमुखता से लिया और लोगों से बातचीत कर न सिर्फ जद में आने वाले धार्मिक स्थलों को हटवाया बल्कि कोर्ट में लंबित प्रकरणों का भी निपटारा करा जाम की समस्या के निस्तारण के लिए पहल शुरू की। वर्षों पुरानी जाम की समस्या के निदान के लिए डीएम मन्नान अख्तर ने ऑपरेशन जन सहयोग चलाया जो बेहद सफल रहा। दोनों धर्मों के धार्मिक स्थल शांतिपूर्वक हटाए गए और चुनावी वर्ष में तेज गति से कार्य शुरू हो गया। जिससे यह मुद्दा अब हल होता दिख रहा है और पिछले दो चुनावों से मुद्दा बना कालपी हाईवे इस बार चुनावी चर्चा से दूर नजर आ रहा है।

अधिवक्ता राकेश द्विवेदी का कहना है कि ऐतिहासिक नगरी कालपी की पहचान कभी धार्मिक स्थलों की वजह से थी, लेकिन पिछले दो दशकों में यहां की पहचान जाम से होने लगी है। 2009 के लोकसभा चुनाव के बाद यह जाम सभी चुनावों में जिले का एक बड़ा मुद्दा बना रहा। अब लग रहा है कि समस्या से निजात मिलेगी।

एमएसवी इंटर कालेज के शिक्षक नरेंद्र यादव कहते हैं कि हाईवे के मुद्दे पर कई सालों से सिर्फ राजनीति हुई है। लोकसभा व विधान सभा चुनाव में नेताओं ने जिले की इस प्रमुख समस्या को मुद्दा बनाकर सत्ता की कुर्सी हथियाई है। यह मुद्दा जनता के संघर्ष और सहयोग की वजह से हल होता दिख रहा है। इसके लिए नेता नहीं बल्कि प्रशासन को इसका श्रेय जाता है।
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