उरई (जालौन)। सपा-बसपा गठबंधन के जमीनी स्तर पर न उतरने की तमाम आलोचनाओं को दरकिनार करते हुए जालौन लोकसभा सीट में गठबंधन का असर दिखाई दिया, लेकिन यह गठबंधन भी प्रत्याशी को जीत की दहलीज तक भी नहीं पहुंचा सका। आंकड़े बताते हैं कि जिले में सपा व बसपा का वोट ट्रांसफर भी हुआ, लेकिन यह जीत के जादुई आंकड़े से काफी दूर रहा।
प्रदेश में सपा-बसपा के गठबंधन को मिली करारी हार के बाद दोनों दलों की आलोचनाओं का दौर शुरू हो गया। जानकारों की मानें तो सपा-बसपा का गठबंधन सिर्फ मंच के ऊपर बड़े नेताओं तक सीमित रहा। अखिलेश यादव व मायावती के तमाम प्रयासों के बाद भी सपा-बसपा का गठबंधन जमीनी स्तर पर नहीं हुआ। जिस वजह से एक दूसरे का वोट ट्रांसफर नहीं हो सका।
हालांकि इस गठबंधन से मुस्लिम मतदाता तो एकजुट दिखे, लेकिन सपा बसपा की लंबी दुश्मनी की वजह से दोनों पार्टियों के कैडर वोट एक जुट न हो सके। इससे प्रदेश में सपा-बसपा गठबंधन को करारी हार का सामना करना पड़ा, लेकिन इन समीकरण को गलत साबित करते हुए जिले के कैडर वोटों एकजुटता दिखाई। आंकड़े बता रहे हैं कि जिले में गठबंधन तो सफल रहा, लेकिन जीत नहीं मिली।
वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा प्रत्याशी बृजलाल खाबरी को कुल 261429 मत प्राप्त हुए थे जबकि सपा प्रत्याशी घनश्याम अनुरागी को 180921 वोट मिले थे। अगर 2014 में दोनों पार्टियों के वोटों को मिला दिखा जाए तो यह संख्या करीब 4,42,350 पर पहुंच रही है। वहीं 2019 में दोनों पार्टियों के गठबंधन के बाद प्रत्याशी को 4,23,386 मत प्राप्त हुए है जो लगभग बराबर कहे जा सकते हैं। दोनों ही चुनाव में महज 18,964 वोटों का अंतर है जो यह बताता है कि जिले में गठबंधन तो हुआ, भले ही जीत न मिली हो। दोनों ही पार्टियों के वोट प्रतिशत में भी मामूली गिरावट दर्ज की गई है। इसमें 2014 में सपा-बसपा को कुल 39.88 प्रतिशत वोट मिले थे वहीं 2019 में दोनों दलों को 37.47 प्रतिशत वोट मिले।