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संघर्ष से खुद उठीं, औरों की भी जिंदगी संवारी

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उरई। महिलाएं आज की तारीख में हर क्षेत्र में बुलंदी पर हैं। गांव, कस्बा या फिर शहर हो, हर जगह नारी पुरुषों के बराबर तो कहीं एक कदम आगे ही खड़ी नजर आ रही है। कहीं संघर्ष कर अपने घर को चला रही है तो कहीं गांव की प्रधानी कर पूरे गांव की जिम्मेदारी अपने कंधों पर लिए हुए है। इतना ही नहीं एक-दो तीन नहीं बल्कि 34 बार रक्तदान और देहदान कर समाज सेवा के क्षेत्र में भी वह कर दिखाया, जिसे सिर्फ सोचा ही जा सकता है, करना हर किसी के वश की बात नहीं है। जिले में भी कुछ ऐसी महिलाएं हैं, जो अपने हौसलों, साहस और धैर्य से समाज में अपनी जगह बनाते हुए दूसरों के लिए भी प्रेरणा का काम कर रही है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर ‘अमर उजाला’ ने कुछ ऐसी ही महिलाओं से संघर्ष की दास्तां व अनुभव साझा किया है, पेश है रिपोर्ट
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34 मर्तबा रक्तदान कर बचाई लोगों की जिंदगी
उरई। रक्तदान कर जीवन बचाने की मुहिम का अहम हिस्सा बनी जिले की डॉ. ममता स्वर्णकार का नाम हर उस जगह पर लिया जाता है, जहां पर किसी को रक्त की आवश्यकता होती है। डॉ. ममता अकेली ऐसी महिला हैं, जिन्होंने ने अब तक 34 मर्तबा रक्तदान कर लोगों की जिंदगी बचाई है। इस कारण ही उन्हें रक्तकर्णिका का नाम भी दिया गया है। बात सिर्फ रक्तदान की ही नहीं है, डॉ. ममता ने अपना देहदान भी किया हुआ है। पेश से व्यायाम शिक्षक होने के बाद भी डॉ. ममता महिला पतंजलि योग समिति की अगुवाकार भी हैं। एमए संस्कृत से गोल्ड मेडलिस्ट, शिक्षा शास्त्र से पीएचडी करने वाली डॉ. ममता पौधरोपण, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, मतदाता जागरुकता, ऊर्जा संरक्षण से जुड़े कार्यों में भी बढ़चढ़ हिस्सा लेती है। डॉ. ममता का कहना है कि एक समय था, जब वे भी साधारण सी लड़की ही थी। एक बार अस्पताल में किसी को एक बोतल खून के लिए दम तोड़ते देखा, बस वहीं से ठान लिया कि अपने जीते जी किसी को खून की कमी से मरने नहीं देंगी। अब तक 30-35 रक्तदान शिविर भी जनपद में संचालित करा चुकी है। योग की कक्षाएं चलाकर बेटियों में योग के प्रति उत्साह पैदा किया।

जुआ, शराब के खिलाफ महिला प्रधान ने लड़ी लड़ाई
कदौरा। कदौरा विकास खंड के बागी गांव की प्रधान अर्चना तिवारी ने करीब 13 साल पहले एक बहू की तरह अपने ससुराल बागी में कदम रखा था, किसी को नहीं पता था कि अर्चना एक दिन गांव की महिलाओं की आवाज बनेंगी। वह आवाज जो गांव के शराबी और जुआरी लोगों के सिर का दर्द भी साबित होगी। अर्चना के पति विजय फौज में रहे हैं, जिस कारण घर के कामकाज के बाद उनका अधिकांश समय गांव की महिलाओं के बीच ही बीतता था। गांव की महिलाओं ने जब उन्हें बताया कि घर के आदमी सारा पैसा जुआ और शराब में उड़ा देते हैं, इस पर अर्चना ने गांव की महिलाओं को साथ लेकर जुआ और शराब के खिलाफ थाना चौकी नापना शुरू किया। जिसके बाद जुआ, शराब तो बंद हो गया, लेकिन अर्चना की महिलाओं के बीच सक्रियता ऐसी बढ़ी कि 2015 में उन्होंने प्रधानी का चुनाव भी जीत लिया। फिलहाल में अर्चना महिलाओं का समूह बनाकर उन्हें स्वावलंबी भी बना रही है। झांसी मंडल के कमिश्नर और जनपद के डीएम से भी अर्चना सम्मानित हो चुकी है।
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अनपढ़ होकर भी गांव में जगाई शिक्षा की अलख
माधौगढ़। क्षेत्र के बीहड़ स्थित गीधन की खोड़ में रहने वाली गायत्री पाल ने शिक्षा की ऐसी अलख जगाई, जिसकी मिसाल आमतौर पर कम ही देखने को मिलती है। जीवन भर अशिक्षा का दंश झेलने वाली 58 साल की गायत्री के प्रयासों से न केवल उनकी बेटियों को ही शिक्षा मिली बल्कि गांव में सरकारी स्कूल खुला और पूरे गीदन के खोड़ की लड़कियां आज शिक्षा प्राप्त कर रही हैं।
गायत्री पाल उरई से 20 किमी दूर ऐरी रामपुरा में पैदा हुई। उस वक्त मां बाप लड़कियों की शिक्षा में रूचि नहीं रखते थे। लड़कों को स्कूल जाते देख उदास गायत्री मन मसोस कर रह जाती है। फिर गायत्री की शादी गीधन खोड़ निवासी शिवपाल सिंह के साथ हुई। शादी के बाद दो बेटी मीरा और नीरजा हुई। ससुराल वाले मीरा और नीरजा को पढ़ाने के खिलाफ थे। बस यहीं से गायत्री के मन में दबी शिक्षा की चिंगारी शोला बनी और उसने ठान लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए वह अपनी बेटियों को अनपढ़ नहीं रहने देगी। किसी तरह पति को मनाया, लेकिन अभी भी ससुराली और पूरा गांव बेटियों की पढ़ाई के खिलाफ ही था। गायत्री ने हार नहीं मानी, बड़ी बेटी मीरा का 6किमी दूर माधौगढ़ के प्राइमरी स्कूल में दाखिला कराया। एक वर्ष वाद सन 2000 में समाज सेवी संस्था ने गांव में स्कूल खोला। जिसमें गायत्री की दोनों लड़किया पढ़ने लगी। एक बड़ा सपना तब पूरा हुआ जब मीरा ने अच्छे अंकों के साथ पांच की परीक्षा पास की। गायत्री को लगा कि उसकी तपस्या रंग ला रही। यहीं से गायत्री के इरादों को और मजबूती मिली। गायत्री को देख गांव की अन्य महिलाओं ने भी बेटियों का हाथ पकड़कर उन्हें स्कूल तक पहुंचाया। इसी मुहिम को आगे बढ़ाते हुए गायत्री ने गांव की रजनी पाल, फूल कुंवर, श्यामबाई, गुड्डी, फूलन देवी, छोटी, राजेश्वरी के साथ मिलकर गांव में प्राथमिक स्कूल खोले जाने के लिए संघर्ष शुरू किया। तहसील दिवस से लेकर डीएम दफ्तर तक कागज दौड़ाए। सन 2005 में जिलाधिकारी ने गांव में प्राथमिक स्कूल के लिए धन आवंटित किया। इसके बाद गांव के स्कूल में बेटियों की भी आवाज गूंजने लगी। गायत्री का कहना है कि बिना शिक्षा के महिला अधूरी है, वह अपने अधिकारों के लिए लड़ भी नहीं सकती है। यही वजह है कि जिस कारण उसने गांव की बच्चियों को साक्षर बनाने की ठानी और उसे पूरा भी कर दिखाया।

जनसंख्या नियंत्रण की मुहिम चलाकर पाया सम्मान
उरई। कदौरा ब्लाक के गांव सुरहती में दो साल के अंदर 17 पुरुषों ने नसबंदी कराई, इनमें एक व्यक्ति तो ऐसा है जिसके सिर्फ दो बेटियां ही है। उसे भी प्रोत्साहित करने का यह काम किया है गांव की आशा बहू प्रवीणा ने। इसके लिए प्रवीणा को वर्ष 2016 व 2017 में तत्कालीन जिलाधिकारी रामगणेश सम्मानित भी कर चुके हैं।
गांव की महिलाओं व किशोरियों को स्वास्थ्य के लिए जागरुक करने के लिए वह लगातार काम कर रही है। 29 वर्षीय प्रवीणा आशा बताती हैं कि वह कक्षा आठ तक पढ़ी थी। तभी उनके पिता ने उनकी शादी सुरहती के सूरज सिंह यादव के साथ कर दी। सूरज सिंह खेती किसानी करते थे, जबकि वह पढ़ लिखकर कुछ करना चाहती थी। वर्ष 2006 में गांव के प्रधान कामता प्रसाद ने उन्हें आशा बहू बनवा दिया। इसके बाद वह गांव में घर-घर जाकर महिलाओं की स्वास्थ्य संबंधी मदद करने लगी। आशा के काम के साथ साथ प्रवीणा ने अपनी आगे की पढ़ाई भी शुरू कर दी। वर्तमान समय वह एमएसडब्लू की पढ़ाई कर रही है। प्रवीणा ने बताया कि उनके गांव की आबादी 1250 के करीब है। इसमें करीब छह सौ महिलाएं हैं। यदि कोई महिला गर्भवती होती है तो महिलाओं की समय समय पर जांच करवाती है। जनसंख्या नियंत्रण के उनके प्रयासों की अब गांव भर में सराहना भी होने लगी है।
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