वाकई जिकरपुर ऐतिहासिक गांव है। बेशक इस इतिहास के कोई लिखित प्रमाण किसानों के पास नहीं मगर बड़े बुजुर्गों से सुने किस्सों के अनुसार बंटवारे के वक्त पाकिस्तान जाने वालों ने यमुना के इस खादर की जमीनों को एक-एक रुपये बीघा से भी कम कीमत में किसानों को बेचा तो शायद उन किसानों को भी नहीं पता था कि यह जमीन कभी करोड़ों की होगी।
ऐसे मिली बंटवारे के वक्त जमीन
गांव जिकरपुर के मुनीम सिंह बताते हैं कि उनके पिता रामप्रकाश और गांव के ही खजान सिंह लाहौर के वायसराय विभाग में काम करते थे। बंटवारे के वक्त जब वे यहां आए तो यहां से जाने वाले मुसलिम 155 बीघा जमीन एक रुपये प्रति बीघा के हिसाब से उनके पिता को बेच गए थे।
लिखा-पढ़ी भी खड़े-खड़े की थी, जिसके दस्तावेज आज भी तहसील के रिकार्ड में हैं। चकबंदी में जमीन घटकर 61 बीघा रह गई थी। वे बताते हैं कि मूलत: उनका परिवार गोंडा के सुबकुरा से यहां आकर बसा था।
उस समय उनके दादा को ससुराल की 100 बीघा जमीन पट्टेदारी पर मिली थी, जिसका लगान जाता था, जबकि 12 बीघा जमीन इनाम में मिली थी। जो बाद में चार हिस्सों में बंटी और एक हिस्सा 11 लाख रुपये में एक्सप्रेस वे में गया। वे बताते हैं कि 1942 में उनके गांव के मुसलिम परिवार के युवक ने एएमयू से बीई किया, जो बाद में पाकिस्तान चले गए।
यह बताता है गजेटियर
गजेटियर के अनुसार, आजाद भारत से पहले खैर मेरठ कमिश्नरी का हिस्सा था। टप्पल सरधना साम्राज्य में था।
यहां दो किले बने, जिनमें से एक के अवशेष हैं, जबकि दूसरे किले पर थाना आज भी है। यहां से अलीगढ़ तक एक सड़क थी। 1836 में टप्पल और इस पूरे क्षेत्र पर अंग्रेजी हुकूमत का कब्जा हुआ।
यह इतिहास देश-दुनिया में गूंजा
ऐतिहासिक टप्पल और उसके ऐतिहासिक गांव जिकपुर का दूसरा इतिहास रहा यमुना एक्सप्रेस वे बनने के दौरान 14 अगस्त, 2010 हुआ कांड। देश-दुनिया की मीडिया, देश भर के नेताओं का जमावड़ा यहां था।
देश की सर्वोच्च पंचायत संसद में भू अधिग्रहण कानून बदलाव की प्रक्रिया शुरू हुई। नेहरू-गांधी परिवार के वंशज और कांग्रेस के युवा नेता राहुल गांधी इस इलाके में पांच दिन डेरा डाले रहे। आलम यह हो गया कि अब आप सर्च इंजन गूगल पर टप्पल सर्च करेंगे तो तमाम जानकारियां उपलब्ध हैं।