उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने लघु और मध्यम उद्यमियों के काम में अफसरों की लालफीताशाही की शिकायत पर कड़ा रुख अपनाते हुए उन्हें सख्त चेतावनी दी है।
उन्होंने आईएएस अफसरों को आगाह किया है कि वे क्लर्कों की सलाह से काम करना बंद कर दें। वे काम में देरी के लिए क्लर्कों की टिप्पणी की आड़ नहीं ले सकते। अनावश्यक रूप से फाइलें लटकाने का रवैया छोड़ दें।
उन्होंने अड़ंगेबाज अफसरों को एक सप्ताह का अल्टीमेटम देते हुए चेतावनी दी कि जिसके पास समय से ज्यादा फाइलें पेंडिंग होने की शिकायत आएगी, सबसे बड़ी कार्रवाई होगी।
मुख्यमंत्री बुधवार को इंदिरा प्रतिष्ठान में इंडियन इंडस्ट्रीज एसोसिएशन (आईआईए) की ओर से आयोजित उद्यमी महासम्मेलन को संबोधित कर रहे थे।
इससे पहले आईआईए के प्रदेश अध्यक्ष जुगुल किशोर और संचालक अजय कुमार ने शासन में तेजी से निस्तारित होने के लिए भेजी जाने वाली फाइलें पांच से छह महीने तक लटकाने और उद्यमियों की पहचान उनके ‘जेब’ देखकर करने की शिकायत की थी।
मुख्यमंत्री ने संबोधन के दौरान उद्यमियों की शिकायतों पर सहमति जताई और नौकरशाही पर जमकर बरसे। उन्होंने सीधे आईएएस अफसरों पर निशाना साधा।
मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार का एक साल पूरा हो चुका है। वह आईएएस एसोसिएशन के सम्मेलन में भी अफसरों को आगाह कर चुके हैं लेकिन शिकायतें कम नहीं हो रही हैं। मुख्यमंत्री ने एक बार फिर आईएएस एसोसिएशन के सम्मेलन की बात दुहराई।
उन्होंने कहा कि नीचे से आने वाली फाइलें ऊपर के अफसरों द्वारा फिर नीचे लौटा दी जाती हैं। यह परंपरा ठीक नहीं है। यदि क्लर्क ने कुछ गलत लिखा तो फिर उसके पास भेजने का क्या मतलब? यदि क्लर्क की ही बात माननी है तो फिर काहे के आईएएस? काहे के बड़े अफसर?
मुख्यमंत्री ने कहा कि अफसरों को फाइलें नीचे भेजने की जगह उसकी रुकावटें दूर कर आगे बढ़ानी चाहिए। सरकार काम चाहती है। उन्होंने कहा कि जो रुकावट बनेंगे उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी।
हमें जल्दी की परिभाषा बता दीजिए मुख्यमंत्री जी!
केस एक: नीचे से फाइलें तेजी से निपटाने के लिए भेजी जाती हैं। 6-8 महीने तक फाइलें लंबित। इस जल्दी की परिभाषा हम नहीं समझ पा रहे मुख्यमंत्री जी। सरकार ने दवा देने के लिए कहा लेकिन नौकरशाही मरने के बाद दवा दे तो क्या फायदा होगा? यदि उद्यम बंद हो जाए फिर फाइलों पर फैसला हो तो उद्यमी क्या करेगा? उद्यमी चाहते हैं कि जो होना हो अफसर वही करें। जो नहीं कर सकते लिखकर बता दें। लेकिन इस तरह परेशान न करें?- जुगुल किशोर, प्रदेश अध्यक्ष आईआईए
हमारी जेब देख कर पहचान करते हैं अफसर
केस दो- ‘‘पशु मेले में पशुओं की पहचान दांत देखकर की जाती है। हमारी पहचान हमारी जेब से की जाती है। परेशान किया जाता है। इस दांत गिनाई से मुक्ति दिलाएं, हम बहुत आभारी होंगे।’’--
अजय कुमार सक्सेना, मंच संचालक (मुख्यमंत्री के भाषण से ठीक पहले की अपील)
चना और मटर में सरकार को कर रहे गुमराह
केस तीन: बेसन चने से भी बनता है और मटर से भी। सरकार ने चने के बेसन को टैक्स फ्री कर दिया, मटर पर 12.5 प्रतिशत टैक्स लगा दिया। उद्यमी ट्रिब्यूनल गए। ट्रिब्यूनल ने फैसला दिया कि टैक्स समान होना चाहिए। हमारी समझ थी कि सरकार चने के साथ मटर को भी टैक्स फ्री कर देगी। मगर पता नहीं कौन अफसर सरकार को समझा रहा है कि चने पर चार प्रतिशत टैक्स लगाकर मटर पर भी चार प्रतिशत कर दिया जाए। ऐसा करकेसरकार सोचती है कि उद्यमी खुश हो जाएंगे। लेकिन उद्यमी समझते हैं कि जीरो टैक्स को चार प्रतिशत बढ़ाने का प्रयास हो रहा है।- जुगुल किशोर, प्रदेश अध्यक्ष आईआईए
जब तक एक अफसर को समझाते हैं दूसरा आ जाता है
केस चार: अधिकारी विभाग में आते हैं। उद्यमी अपनी बात उन्हें समझाने की कोशिश करते हैं। दो-चार महीने में जब तक वह अफसर समझता है कि उसका ट्रांसफर कर दिया जाता है। उद्यमियों को इसी तरह की विडंबना से दो चार होना पड़ता है। सरकार को यह समझना होगा कि बिना स्थायित्व के न तो सरकार चल सकती है और न ही उद्योग धंधे और न ही नौकरशाही। ऐसे में अफसरों को भी पद पर स्थायित्व जरूरी है।
- जुगुल किशोर, प्रदेश अध्यक्ष आईआईए