सियासत के खेल किस तरह सामाजिक रिश्ते और ताना-बाना तोड़ते हैं, यह देखना है तो वेस्ट यूपी के प्रमुख आर्थिक केंद्र मुजफ्फरनगर-शामली आइये।
क्राइम कैपिटल जैसे विश्लेषणों से नवाजे गए इन जिलों पर अब दंगे का बदनुमा दाग भी लग गया। पश्चिमी यूपी में 26 साल बाद सेना को दंगा नियंत्रण के लिए उतारा गया तो इसी क्षेत्र में।
उन्माद का जुनून जैसे-जैसे उतर रहा है, दंगे के असर और नफे-नुकसान का आंकलन होने लगा है। राजनीतिज्ञों पर सीधी उंगलियां उठ रही हैं। लोग कह रहे हैं कि सियासत के दांव में इंसानियत हार गई।
मुजफ्फरनगर, शामली और बागपत में खाप पंचायतों के जरिए सदियों से कायम हिंदू-मुस्लिम की 36 बिरादरी की एकजुटता को राजनीतिज्ञों के दांव-पेंच ने चंद लम्हों में तोड़ दिया।
शोरम की सर्वखाप पंचायत ने 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में बढ़-चढ़कर भाग लिया था। सर्वखाप में आपसी झगड़े मिल बैठकर निपटाए जाते हैं। इसे सभी लोग मानते भी रहे हैं। हां, सगोत्रीय और प्रेम विवाह जैसे मुद्दों पर सर्वखाप पंचायत की सोच जरूर परंपरावादी रही है।
इसी सर्वखाप पंचायत के हेडक्वार्टर शोरम से इस बार उन्माद के बीज डालने की शुरूआत की गई। करीब एक माह पहले हालात यहां तक पहुंचे कि हिंदू-मुस्लिम जाट आपस में टकरा गए। मारपीट और आगजनी तक हुई। आखिर में समझौता हुआ, लेकिन दिलों की दरार नहीं पाटी नहीं जा सकी।
छेड़छाड़ को बना रहे दंगों का कच्चा माल:
कवाल की घटना के बाद यह बात साफ हो गई कि वेस्ट यूपी में छेड़छाड़ की घटनाएं बेहद संवेदनशील हो गई हैं। यह मुद्दा ऐसा है जिसे थाने और कोर्ट कचहरी ले जाने के बजाए खुद ही फैसला कर लेने पर आसानी से समाज की मुहर लगवा ली जाती है।
यदि छेड़छाड़ करने वाला दूसरे समुदाय से है तो मामला और गंभीर हो जाता है। कवाल में तीन युवकों की हत्या से पहले शोरम और शामली में छेड़छाड़ को लेकर माहौल खूब गरमाया, जमकर राजनीति की गई।
छेड़छाड़ के विवाद ऐसे मुद्दे रहे जिसका दोनों पक्ष बैठकर हल निकाल सकते थे, लेकिन उसे टकराव में बदलने में प्रशासनिक तंत्र और राजनीतिज्ञों, दोनों की भूमिका रही। समस्या का हल निकालने के बजाय सियासदां इसे दंगे के कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं।
खूब सिकीं सियासत की रोटियां
27 अगस्त को छेड़छाड़ के विवाद में कवाल गांव में गौरव और सचिन ने शाहनवाज की हत्या कर दी थी। इसकी प्रतिक्रिया में कवाल के कुछ लोगों ने मौके पर ही गौरव और सचिन को मार डाला।
ये दोनों घटनाएं न तो सांप्रदायिक थीं और न ही सुनियोजित। वामपंथी रुझान के श्यामबीर सिंह राठी कहते हैं कि शासन-प्रशासनिक चूक ने इन घटनाओं को राजनीति की रोटियां सेंकने का बड़ा प्लेटफार्म बना दिया।
भाजपा और सपा ने इसका फायदा उठाया। फर्जी नामजदगी वापस लेने में 13 दिन लगा दिए गए। यह काम पहले कर दिया जाता तो लोगों को ये दिन नहीं देखने पड़ते।
धर्मों में बंट गए सियासतदां :
घटना के बाद जिले में राजनीति का गंदा रूप सामने आया। अधिकतर नेता अलग-धर्मों में बंट गए। कुछ घरों पर बैठकर तमाशबीन बने रहे। एक संप्रदाय के नेता शाहनवाज के यहां संवेदना जताने जा रहे थे तो दूसरे गौरव-सचिव के गांव में।
उन्होंने लाशों और जवान मौतों पर आपसी खेमेबंदी कर ली। आखिर वोटों की लहलहाती फसल जो दिख रही थी। एक भी राजनीतिक दल ने इतनी संवेदनशीलता का परिचय नहीं दिया कि वे इस विवाद को यहीं समाप्त कराने के लिए दोनों पक्षों से बात करते। राजनीतिज्ञों की भूमिका एकपक्षीय भावनाएं भड़काने और उन्माद पैदा करने वाली रहीं।
एक मंच-एक धर्म
27 अगस्त बाद हर घटनाक्रम तेजी से बदला। बसपा सांसद कादिर राणा ने 30 अगस्त को शहर में पंचायत बुलाई तो उसमें कांग्रेस नेता और पूर्व सांसद सइदुज्जमां, सपा के प्रदेश सचिव राशिद सिद्दीकी, बसपा विधायक नूर सलीम राणा और मुस्लिम सियासत से जुड़े प्रमुख नेता एक मंच पर थे।
धारा 144 लागू होने के बावजूद डीएम और एसएसपी इस पंचायत में ज्ञापन लेने गए। 31 अगस्त को शोकसभा के नाम पर तमाम प्रतिबंधों को तोड़कर नंगला मंदौड़ में बड़ी पंचायत हुई।
इसमें भाजपा विधायक सुरेश राणा, भारतेन्द्र सिंह, संगीत सोम समेत अधिकांश दलों से जुड़े हिंदू नेता शामिल रहे, लेकिन महफिल भाजपा के ही नाम रही। भीड़ के तेवर ऐसे कि नरम रुख अख्तियार करने वालों को बोलने का मौका ही नहीं दिया गया।
प्रशासन ने नहीं दिखाई पारदर्शिता
30-31 अगस्त की पंचायतों के तेवरों के सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिशों से निपटने में प्रशासन ने ईमानदार पहल नहीं की। जिन मुद्दों को लेकर गुस्सा भड़क रहा था, उन पर सिर्फ आश्वासन दिए गए।
इसी से गुस्सा बढ़ा और राजनीतिज्ञों, असामाजिक तत्वों ने उसमें खूब खाद-पानी डाला। खापों से जुड़े असरदार लोगों का भी पूरा इस्तेमाल किया गया। सात सितंबर की महापंचायत के बाद ऐसे तत्व खुलकर खेले। क्रिया-प्रतिक्रिया के नाम पर सदियों पुराना भाईचारा तार-तार हो गया।
गहरी खाई को पाटने में लगेगा लंबा वक्ता
खून-खराबे के बाद सामाजिक खाई इतनी गहरी हो गई कि पाटने में लंबा वक्ता लगेगा। हादसे में कितनी मौतें हुईं, कितने घर जले इस पर तो चर्चा है पर, अभी टूटे दिलों को जोड़ने की कारगर पहल होती नहीं दिख रही है।
कुछ गांवों ने उम्मीद रोशनी दिखाकर अपने स्तर पर पहल की है लेकिन यह नाकाफी है। हिंसा के घायलों के लिए खून की व्यवस्था में जुटे कुटबा निवासी 75 वर्षीय एडवोकेट सुखपाल सिंह कहते हैं कि राजनीतिज्ञों से कोई उम्मीद नहीं है। सब उन्हीं का किया धरा है। लोगों को जोड़ने के लिए बड़े स्तर पर सामाजिक पहल होगी।