65 वर्ष के संसदीय इतिहास में मथुरा से कोई महिला सांसद नहीं चुनी गई। चौधरी चरण सिंह की पत्नी गायत्री देवी और पुत्री डाक्टर ज्ञानवती भी यहां चुनाव लड़ने आई लेकिन जीत नहीं पाई।
अब भाजपा ने मथुरा सीट पर सिने स्टार हेमा मालिनी पर दांव खेल दिया हैं। ‘ड्रीम गर्ल’ के मैदान में आने से चुनाव दिलचस्प हो गया है।
हेमा मालिनी के लिए भी मथुरा वासियों का दिल जीतकर इतिहास बदलने की चुनौती सामने हैं। बड़ा सवाल यही है कि इस बार यह मिथक टूटेगा।
इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जीती थी कांग्रेस
मथुरा के लोगों ने कभी आधी आबादी पर भरोसा नहीं किया। यह क्षेत्र चौधरी चरण सिंह कर्म भूमि के रूप में जाना जाता रहा है।
1984 में यहां चौधरी चरण सिंह की पत्नी गायत्री देवी लोकदल के टिकट पर चुनाव लड़ने के लिए आई लेकिन जीत नहीं पाई। कांग्रेस के मानवेंद्र सिंह जीते थे और उन्होंने एक लाख मतों के अंतर से गायत्री देवी को पराजित किया था।
उस समय इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस के पक्ष में लहर थी और लोकदल के सारे समीकरण धवस्त हो गए थे। मानवेन्द्र सिंह ने इस चुनाव में 58.69 प्रतिशत मत हासिल किए तो ज्ञायत्री देवी को 35.64 प्रतिशत मत ही मिल सके।
अजित सिंह की बहन हार चुकी है चुनाव
इस दो दशक बाद 2004 में यहां से चौधरी चरण सिंह की पुत्री और रालोद अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह की बहन डाक्टर ज्ञानवती रालोद के टिकट पर मैदान में उतरी।
इस दौरान समीकरण काफी बदल गए थे। रालोद और सपा के बीच गठबंधन था। इसके बाद भी ज्ञानवती चुनाव हार गई थी। इस चुनाव में उन्हें हराने वाले भी वही कांग्रेस प्रत्याशी मानवेंद्र सिंह ही थे, जिन्होंने बीस साल पहले उनकी मां गायत्री देवी को पराजित किया था। 1999 में कटोरी देवी निर्दलीय प्रत्याशी थी, उन्हें 1410 मत मिले।
1996 में ललतेश शर्मा तो चार अंकों में भी नहीं पहुंच पाई थी। 2009 में जयंत चौधरी ने मथुरा की सीट जीती लेकिन तब भाजपा के साथ रालोद का गठबंधन था। इस बार जयंत चौधरी के साथ कांग्रेस का साथ हैं। हेमा मालिनी के लिए इस सीट पर इतिहास बदलने की चुनौती है तो रालोद ने मुकाबले के लिए रालोद जयंत चौधरी के चुनाव प्रचार की कमान उनकी पत्नी चारु को सौंपने की तैयारी में हैं।