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दुकान की रोजाना की कमाई ले जाते थे सूदखोर

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दुकान की रोजाना की कमाई ले जाते थे सूदखोर
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नगर में काफी गहरी हैं सूदखोरों की जड़ें, दबंगई से होती है कर्ज की वसूली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, सिकंदराराऊ (हाथरस)
सिकंदराराऊ। सतीश वास्तव में ऐसे सूदखोरों के जाल में फंसा था, जोकि बिना लिखा-पढ़ी कर हजारों रुपया कर्ज उसे दे देते थे, लेकिन इस रकम का सूद इतना मोटा होता था कि उसकी राशि मूल कर्ज से ज्यादा हो जाती थी। इस रकम को चुकाने में असफल रहने पर ही उपजे मानसिक संताप ने सतीश को जान देने पर मजबूर कर दिया।
जिस तरह सतीश ने मरने से पहले अपने दोनों मासूम बेटों के हाथ की नस काटीं, उससे माना जा रहा है कि उसका इरादा परिवार को साथ ले जाने का था, लेकिन सतीश की पत्नी ने यह दृश्य देख लिया और चीखकर परिवार वालों को इकट्ठा कर लिया। गुरुवार की रात को ही बच्चों को चिकित्सक के यहां ले जाया गया। उनकी तो जान बच गई, लेकिन रात से ही सतीश अपने कमरे में बंद था।
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घटना रात करीब दो बजे की थी, इसलिए बच्चों को बचाने के बाद सभी लोग सो गए। बता दें कि नगर में सूदखोरों का जाल फैला हुआ है। वह मोटी ब्याज दर पर कर्ज देेते हैं। सूद की उगाही के लिए इन लोगों ने कुछ दबंग किस्म के युवक भी रख रखे हैं, जो कि प्रतिदिन तीन-चार की संख्या में सूद की उगाही धमकी देकर करते रहते हैं। इनका निशाना दुकानदार, चाट वाले और छोटे व्यापारी होते हैं। बता दें कि सतीश के कर्ज का पता उसके पिता और भाई को लगा तो उन्होंने कुछ दिन पूर्व ही दस लाख से ज्यादा का कर्ज अदा भी किया था।
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कर्जदारों से यह भी लिखवा लिया था कि अब वे कर्ज नहीं देंगे, लेकिन सूदखोर नहीं माने और सतीश को दोबारा कर्ज दे दिया। उस कर्ज के सूद के लिए उसे तंग किया जाने लगा। दुकान पर जो भी बिक्री होती थी, उसे सूदखोर ले जाते थे। हालात इतने बदतर हो गए कि सुबह दुकान खुलते ही सूदखोर आ बैठते थे और जो भी बिक्री होती, उसे जबरिया छीनकर ले जाते। सूदखोर इतने सशक्त हो गए हैं कि इनके खिलाफ कोई नहीं बोलता। सतीश की मौत ने उसके तीन बच्चों दो बेटे और एक बेटी के भरण-पोषण पर भी सवाल खड़ा कर दिया है। कई महीने पहले नगर के मंडी गांधीगंज के दुकानदार को भी सूदखोरों ने इतना परेशान किया कि वह सिकंदराराऊ छोड़कर ही चला गया। करीब 15 दिन बाद उसका पता चल सका।
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