अखिलेश वार्ष्णेय
नोट बंदी के दौर में अब बिसावर के घुंघरूओं की खनक सुनाई पड़ना बंद हो गई है। इस कारोबार में लगे करीब ढाई हजार मजदूरों की रोजी-रोटी छिन गई है। कारोबारी भी नोटबंदी के चक्कर में माल नहीं मंगा पा रहे हैं, जिससे कारखानों पर ताले पड़ गए हैं और मशीनें खामोश हो चुकी हैं।
छन-छन करती घुंघरूओं की आवाज कभी सादाबाद से लगे कस्बा बिसावर की पहचान थी। देश भर में अपनी धाक जमाने वाला यहां का घुंघरू उद्योग अब किसी के सहारे की तलाश कर रहा है।
सबसे बड़ी ग्राम पंचायत बिसावर और उसके आसपास की दर्जनभर ग्राम पंचायत में के लगभग 30 गांवों में चांदी और गिलट के घुंघरू बनाने का काम लगभग एक दशक से होता आ रहा है।
आज फर्क सिर्फ इतना है कि पहले जहां पूरी तरह से चांदी के घुंघरू बनते थे, आज उसकी जगह अधिकांशत: गिलट ने ले ली है। घुंघरुआें के निर्माण में पुरुषों के साथ महिलाएं और वयस्क भी इस काम में लगे हैं।
घुंघरू उद्योग सही मायने में दर्जनभर ग्राम पंचायतोें में खेती के बाद कुटीर उद्योग के रूप में स्थापित हो गया। यहां तैयार होने वाले घुंघरूओं को मथुरा, आगरा, जयपुर आदि स्थानों पर ले जाकर विक्रय किया जाता है। जहां से आभूषण निर्माता इन्हेें खरीदकर पैरों की पायल से लेकर आभूषण तैयार करते हैं।
कच्चे माल के रूप में चांदी और गिलट लोगों द्वारा आगरा, मथुरा आदि स्थानों से खरीदकर लाई जाती है, लेकिन अब सबकुछ नोटबंदी से थम चुका है।