पूर्व सपा विधायक देवेंद्र अग्रवाल और उनके रिश्तेदार धर्मेंद्र अग्रवाल को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ी राहत दी है। फतेहपुर सीकरी से बसपा की पूर्व सांसद सीमा उपाध्याय की याचिका का निस्तारण करते हुए कोर्ट ने इस मामले में आगे सुनवाई नहीं करने का निर्णय लिया है। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि याचिका के पीछे जनता के हित का उद्देश्य नजर नहीं आता। पेट्रोल पंपों पर मिलावटखोरी की बात मंत्रालय की जांच में भी साबित नहीं हुई। कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने केवल दो ही लोगों को ही पार्टी बनाया है, और वो भी याचिकाकर्ता के राजनीतिक विरोधी हैं।
पूर्व सांसद सीमा उपाध्याय ने वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में आरोप लगाए थे कि देवेंद्र अग्रवाल के पास जिले में आधा दर्जन से अधिक पेट्रोल पंप व डीजल पेटी डीलर के लाइसेंस हैं, जिन पर बड़े पैमाने पर मिलावटखोरी का खेल चलता है। इस पर देवेंद्र अग्रवाल की ओर से अधिवक्ताओं ने पक्ष रखा था, जिसमें कहा गया था कि जो पेट्रोल पंप व पेटी डीलर के लाइसेंस याचिका में दर्शाए गए हैं, वे उनके नहीं हैं। याचिका में आरोप लगाया गया था कि उन्होंने इसी तरह करोड़ों रुपये की संपत्ति कमा ली है।
सीमा उपाध्याय ने इस मामले में कोर्ट से सीबीआई से जांच कराने की मांग की थी। वहीं बचाव पक्ष की ओर से दी गई दलील में कहा गया था कि पेट्रोल पंप पर तेल की गुणवत्ता की जांच पेट्रोलियम मंत्रालय द्वारा तय एजेंसी समय-समय पर करती रहती है। बचाव पक्ष ने याचिका के पीछे याचिकाकर्ता के राजनीतिक हितों की बात कही थी। हालांकि अगस्त 2016 में याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया था और पूर्व जांच के आदेश भी दिए थे। इतना ही नहीं पेट्रोलियम मंत्रालय को चार हफ्ते में जांच रिपोर्ट देने का आदेश भी दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने पेट्रोलियम मंत्रालय से छह हफ्ते में पेट्रोल पंप पर मिलावट रोकने के लिए किए गए उपायों के बारे में बताने को कहा था। इसके बाद संयुक्त सचिव ने हाथरस आकर छानबीन भी की थी। पेट्रोलियम मंत्रालय ने अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को दी थी, जिसमें कोई आरोप साबित नहीं हुए थे। इसके बाद कई महीने तक सुनवाई चली। कोर्ट ने याचिका के पीछे जनहित नहीं होने की बात कहकर आगे सुनवाई करने से इंकार कर दिया।
झूठे साबित हुए आरोप
हाथरस। पूर्व विधायक देवेंद्र अग्रवाल का कहना है कि यह याचिका राजनीतिक विद्वेष के चलते उनके खिलाफ दाखिल की गई थी। न्यायालय के आदेश से स्पष्ट हो गया है कि आरोपों में कोई दम नहीं था और उन्होंने कोई गलत काम नहीं किया है। उनके विरोधियों के आरोप फिर झूठे साबित हुए हैं।