नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ ही अभिभावकों की चिंताएं बढ़ गई हैं। स्कूलों में प्रवेश के दौरान यूनिफॉर्म, किताबों और अन्य शैक्षणिक सामग्री की बढ़ती कीमतों ने अभिभावकों का बजट बिगाड़ दिया है। खासतौर पर निजी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावक महंगे सिलेबस और निर्धारित दुकानों से इसकी खरीदारी की बाध्यता से परेशान नजर आ रहे हैं।
शहर के कई स्कूलों में किताबें केवल एक तय दुकान पर ही उपलब्ध कराई जा रही हैं। ऐसे में अभिभावकों को न तो विकल्प मिल पा रहा है और न ही कीमतों पर कोई नियंत्रण रह गया है। परिणामस्वरूप उन्हें मजबूरी में महंगी दरों पर किताबें खरीदनी पड़ रही हैं। अभिभावकों का कहना है कि पिछले वर्ष जहां एक कक्षा का पूरा सिलेबस करीब 2,500 रुपये में मिल जाता था, वहीं इस बार वही सिलेबस 3,500 रुपये या उससे अधिक में मिल रहा है।
इस तरह करीब 20 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी ने मध्यमवर्गीय परिवारों की आर्थिक स्थिति पर सीधा असर डाला है। कुल मिलाकर नए सत्र की शुरुआत जहां बच्चों के लिए उत्साह लेकर आई है, वहीं अभिभावकों के लिए बढ़ता खर्च चिंता का कारण बन गया है।
यूनिफाॅर्म के भी बढ़े दाम
स्कूलों द्वारा निर्धारित दुकानों से ही यूनिफॉर्म खरीदने की अनिवार्यता के चलते अभिभावकों को इसके लिए भी ऊंची कीमत चुकानी पड़ रही है। कई जगह गुणवत्ता के मुकाबले कीमत अधिक होने के कारण अभिभावकों दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। इनके दामों में भी इस बार पांच से दस फीसदी तक का इजाफा है।
एनसीईआरटी की पुस्तकें शामिल करने की पहल से राहत
शासन की सख्ती के बाद कुछ बड़े स्कूलों ने कक्षा एक से आठ तक के सिलेबस में एनसीईआरटी की किताबें शामिल करना शुरू किया है। इससे कुछ एक स्कूलों के सिलेबस की कीमतें कम हैं। कुछ स्कूलों ने दो हजार रुपये कीमत की एआई की किताब को अपने सिलेबस से ही निकाल दिया है। इससे उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले समय में किताबों की कीमतों में कुछ नियंत्रण आ सकेगा और अभिभावकों को राहत मिलेगा।
समस्या के मुख्य कारण
-निर्धारित दुकानों पर निर्भरता
-निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें
-सिलेबस में अनावश्यक बढ़ोतरी
-यूनिफॉर्म पर एकाधिकार
अभिभावकों की मांग
-किताबें किसी भी दुकान से खरीदने की छूट मिले
-सिलेबस को सीमित और पारदर्शी बनाया जाए
- यूनिफॉर्म की कीमतों पर नियंत्रण हो
-सरकारी गाइडलाइन का सख्ती से पालन कराया जाए
हर साल फीस के साथ किताबों और यूनिफॉर्म का खर्च अलग से बढ़ जाता है। इस बार तो सिलेबस की कीमत ने पूरी योजना बिगाड़ दी है। अगर हमें खुले बाजार से खरीदने की छूट मिले तो कुछ राहत मिल सकती है।
-अनुराग कुमार निवासी गिजरौली।
स्कूल द्वारा तय दुकान से ही किताबें और यूनिफॉर्म लेनी पड़ती है। वहां मोलभाव की कोई गुंजाइश नहीं होती। एक बच्चे पर ही इतना खर्च हो रहा है। जिनके दो-तीन बच्चे हैं, उनकी हालत ज्यादा खराब है।
-कृष्णा शर्मा निवासी आगरा रोड।